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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

घट--घट सब जग व्यापि रहा सब विधि सम सबमें, रमती सो लीला न्यारी, सब
सबमें व्यापक लखकर जो सब विषय तजे, निष्काम भजे सो नर प्रभु
उस सच्चिदानन्द का जो अंश चेतन जीव कहलाया वह माया रचित जड़ देहके
मोह पाशमें बंध कर प्रभु अंश को भूल गया, मायाग्रस्त होकर घट--घट वासी प्रभु लीला
को भूल गया।
विचार करके देखो, जो सब विधि सब देहधारियों में सम, सब विधि व्यापक सो लीला
तो केवल उस सच्चिदानन्द प्रभु की अर्थात माया रचित संसार की तो केवल रचना है,
केवल मात्र जीव का आधार है, जो कि अनादिकाल से चली; इसका विस्तार तो केवल रचना
की लीला, सो लीला, जो केवल माया रूप का रूप मात्र है, इसलिए न्यारी कहलायी?
सो केवल मात्र उस प्रभु की, जो सब रचना न्यारी करके जो लीला का कर्ता, सो केवल
जो सर्व जगत व्यापकता का काम मात्र करके जगदीश्वर जीव का मन रूप हुआ
रचना रची, सो तो केवल जीव का मन ही विकार रूप माया को स्वीकारता सो वह जीव
केवल स्वरूप में भ्रम में पड़ कर माया भ्रम में प्रभुत्व लीला भुला गया।
सो इसका सार तो उस चेतन सच्चिदानन्द, जो केवल एक ही व्यापक सो सम सो सब
जीवधारियों का मोह विकल करके ही यह मन को जीव केवल विकार रूपी माया सम्मुख हो, सो
निराकार का रूप
सो केवल मात्र निराकार रूपी केवल ज्ञान के बिना सम्भव? सो जो अज्ञानता से उस
घट घट व्यापक सो सम लखकर सब मोह विषय जो माया के त्यागे; सो जो प्रभु
लीला मात्र साक्षात्कार करे, सो नर प्रभु पदवी पावे? सो वह जो सब विधि सम सो
लखे, सो केवल पद पावे सो, त्याग भाव रूपी होकर
उस पर कृपा प्रभु की पावे जो केवल सो समता पावे जिसको कि घट-घट
सब सम लखे, निष्काम भज केवल समता को प्राप्त हो सके, इसके बिना जीव
मोह काम क्रोध के विकार से ग्रसित होकर प्रभु अंश लखने को तैयार नहीं
उस का कारण प्रभु स्वरूप से विमुख हो जाता सो वह, जीव ही विषय वासना रूपी
सब विकार जगत विस्तार रूप में देखता हुआ प्रभु के सम्मुख होने में असमर्थ हो
के; जो निष्काम पद केवल प्रभु कृपा, प्राप्त करने स्वरूप को समझे, निष्काम न हो;
निष्काम केवल प्रभु कृपा ही? सो केवल निष्काम सो ही होता है, जिसके मन में
वासना विकार रूप का कोई लेश
मात्र, नहीं होता केवल एक ओ सच्चिदानन्द रूप लखा सो, न वासनायुक्त मन का कोई
विकार लखा, केवल प्रभु नाम आधार जो निष्काम हो प्रभु पद में मन लीन
केवल सो सम भाव केवल रूप में ही उस सम सच्चिदानन्द को लख ले, स्वयं
निष्काम सच्चिदानन्द के घट--घट सच्चिदानन्दमय रूप बने! सो सच्चिदानन्द कृपा
रूप सदा
स्वरूप के रूप में स्थिर हो वह प्रभु कृपा सच्चिदानन्दरूप में प्रभु रूप होकर
उस प्रभु सम ही स्वयं को लखने की शक्ति प्रभु कृपा द्वारा ही प्राप्त, इसके बिना
वासना विकार का लेश, केवल लेश ही विकल कर दे जो कि जीव को घट--घट
स्वरूप में लखने विकल घट--घट की माया में बांध देता रूप
केवल जीव स्वरूप प्रभु अंश विकार रूप लख कर प्रभु समता को त्याग
रूप लखे? अतः, केवल सो सम भाव केवल प्रभु समता को लख कर वासना
विकार से परे होना मात्र प्रभु; सो सच्चिदानन्द की कृपा-दृष्टि मात्र प्राप्त होकर लख
सकेगा जो कि प्रभु सब घट सम रस को सच्चिदानन्द निष्काम स्वरूप वासना रूप
के परे लखेगा, उस प्रभु स्वरूप
रूप होकर सच्चिदानन्द स्वरूप में ही लीन होगा
केवल प्रभु सब घट रस सम लखे जो प्रभु सो ही सच्चिदानन्द रूप प्रकाश को
लख कर सो निष्काम स्वरूप को लख कर ज्ञान रूप चेतन रूप प्रभु समता को लखेगा,
केवल यह जीव, सो प्रभु पद को प्राप्त कर सके, प्रभु पद को पावे रूप मात्र प्रभु को
सो लख सके प्रभु समता को जो प्रभु के ज्ञान रूप सब घट में रमण करने वाले प्रभु
प्रकाश को घट घट--घट में लखे, घट--घट में समता को लखने वाला ही
सहज मुक्ति को प्राप्त हो कर उस प्रभु ज्ञान घट में घट--घट व्याप्त घट लखे
रूप को प्रकाश रूप में प्रभु समता रूप लखने लगे! जहां सब में समता का ही
प्रकाश सब सम्मुख लख कर सब विकार का नाश हो वासना रूप भव भय दूर भागे
जिससे केवल सम्मुख प्रभु ही प्रकाश रूप दिखे सो सर्व घट में स्थित उस प्रभु
सच्चिदानन्द का ज्ञान ही सब को प्रभु ज्ञान रूप लखे, जहां सम्पूर्ण विकार नष्ट
हो, सच्चिदानन्दमय हो, घट घट, सच्चिदानन्द सो, सो घट--घट में ही प्रभु ज्ञान लखे
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