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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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और इसके सिवाय आत्मा ऐसा तो नहीं जिसे जानना सहज होगा, कठिन होगा, असाध्य
होगा? कठिन होगा, ऐसा न होगा? कठिन तब होता, अगर उसे बाहर से लाना होता
ऐसा कोई पदार्थ जिसे अन्य लोग जानते हों, उसे भीतर लाना होता और भीतर
बैठाना ही कठिन हो गया; परन्तु भीतर बैठा ही हुआ है इसलिए वह कठिन होगा?
बाहर से लाना हो तब तो सोच और श्रम भी करना पड़े पर जो भीतर ही बैठा हुआ
कठिन होगा? सच, बाहर जाना कठिन है, भीतर आना बहुत सहज
पर जब भीतर जाना ही नहीं होता तो यह बात कैसे समझ में आवे कि भीतर की
निवृत्ति कैसी हो सकती, इसका उपाय जानना न पड़े तो फिर और तो क्या हो सकता
भाई, पर इसके लिए जीव बहुत उपाय कर चुका पर मुक्ति नहीं हुई, तब उपाय
किया गया, जिसे यह समझ में आवेगा कि व्यवहार रूप निमित्त मात्र कोई भी
बात से तो काम नहीं होगा? इसका कारण यह, जिसे सब ही कर ही रहे हैं और
करते रहेंगे, क्योंकि यह तो अनादिकाल से ही कर रहे थे। ऐसा जानकर अब निश्चय
जानकर करना होगा कि यह तो व्यवहार ही रहा है, और फिर जो सब संत जन
इस स्वरूप बात कहते आये हैं सो इस बात के विपरीत तो नहीं कह गये हैं और
अगर वे सब संत जन इस प्रकार के उपाय करने से ही मुक्त हुए हैं तब निश्चय
से इसके ही द्वारा मोक्ष होता है सो जान कर ही तो ज्ञानी जन इस पर जोर
लगाते आये हैं। इस बात, उपाय भिन्न--भिन्न प्रकार समझाने का यह एक ही तो
प्रयोजन हो सकता है कि, हम सब इस बात को समझ कर आत्मकल्याण के योग्य
बनें! भला सोचो? यह बात समझ कर कैसे आगे बढ़ें
पहले ऐसा समझो, इसमें तो संशय न रहा? जो भी कह रहे हैं शास्त्र और
संत जन वे आत्मज्ञान के ही लिए कहते आये हैं। इस बात में, जिसे भी संशय होगा सो
सब व्यर्थ समझ लेगा
पर जिसे समझ में आया सो ऐसा न कहे, जो कुछ भी कहा जा रहा
जिसे भी समझा जा सके सो ही कहा जा रहा, समझे बिना काम कैसे चलेगा
क्यों? जो कुछ भी कहा जा रहा उसका लाभ लेना चाहिये न कि इस तरह सोचे कि
केवल सुन लेने से ही सब हो! निश्चय ही! संशय को छोड़ कर? जो कुछ भी कहा
जा रहा सो सब को ही लाभ करने वाला समझना चाहिये सो इस भाव से ही बात
को ग्रहण करे! निश्चय लाभ होगा ही? जो बात कही जा रही है उसको मन न दे तो
क्या
निश्चय जान लो, अज्ञानी, तू तो समय के बीत जाने पर ही पछताये बिना
रहेगा न जब समय बीत कर हाथ से निकल गये अवसर तब सिर पर हाथ रखकर ही
केवल पछता रहेगा न?
पर ज्ञानीजन तो ऐसा नहीं सोचते ऐसा विचार कर ज्ञानी पुरुष तो सब
सांसारिक मोह को ही त्याग दिया करते हैं, वे ही ज्ञानी या तत्वज्ञानी कहला
सकते हैं। जिसे इस बात का भी ज्ञान नहीं वह तो ज्ञानी कहला नहीं सकता, जो भी
ज्ञानी के पास जा कर ही सब तरह का जो भी कुछ जान सकता अवश्य लाभ
उठायेगा पर स्वयं तो नहीं, अपने आप ही तो, जो भी ज्ञानी जन कह रहे हैं
सो, इन बातों द्वारा निश्चय ही मन को इस ओर लगा कर लाभ प्राप्त कर सकता
पर जब तक ही निश्चय होगा तब तक कुछ लाभ होगा
सब सन्देहों को मिटा दो! भाई, सब मन देकर सुनो सुनो सुनो
बात को सुनो सुनो! जो भी कहा गया न समझो कि यह यों ही कहा जा रहा;
यह तो विशेष ज्ञान की बात ही सब को सुनायी जावेगी सो ही इस बात
पर जो भी ध्यान लगायेगा उसका ही तो ही भला होगा सो ही इस प्रकार का ही
फल; ही प्राप्त कर लेगा निश्चय
सो ज्ञानीजन कहते "जो भी संशय मिटा कर मन से शांत होकर सुनेगा उसका
संशय सब मिटेगा या जिसके पास कोई उपाय शंका मिटाने का होगा, सो ही
निश्चय ही तो सब इस सांसारिकता से पार
सांसारिक तो काम सब एक--प्रकार से मन--ही करता रहा न रहेगा; जब ही
इसके पार मुक्ति पायेगा
ज्ञान स्वरूप सदा काल ही सब सांसारिक बातों से अधिक उत्तम ज्ञान
सर्वश्रेष्ठ स्वरूप रहा
हमेशा सांसारिकता से सदा काल मन--मुक्त रहने पर ही कल्याण स्वरूप को
प्राप्त कर सकता और जो इस प्रकार का मन बना लेवेगा सो ही सांसारिक बन्धन
रहित हो कर, जो सिद्ध रूप निश्चय रूप प्राप्त कर लेगा, सो ज्ञानी पुरुष
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