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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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विचार कर विचार पूर्वक काम को हाथ में मत लो तब तक जब तक सन्देह रहे उस
बात, उस विषय पर चिन्तन करते रहो व ऐसा समाधान प्राप्त करो कि फिर मन में कोई
हिचकिचाहट अथवा संशय बाकी न रह जाय या तो ऐसा करो व जो यह न हो, काम करना
बहुत जरूरी हो! तत्काल तय करो निश्चय कर लो कि अब फैसला तय संशयमुक्त
कर ही लिया गया इसके जो नतीजे निकलेंगे हम डट कर उनका सामना कर लेंगे और
संशय को त्याग कर काम में जुट जाओ लगनपूर्वक, ईश्वर जरूर सफलता
का आशीर्वाद या फल देगा ही ऐसा निश्चय रखो तो यह न हो कि अरे! काम तो
बिगड़ गया! संशय बना रहेगा संशय मिटा नहीं! संशय मिटने का उपाय संशय से रहित
काम करो! काम करो, निश्चयी बन कर करो! निश्चयपूर्वक!
यह ख्याल रहे, जो शंका दूर हो सकती बुद्धिरूपी खुरपी से काम निकालकर विचार
रूपी अज्ञानांधकार को; जो हो सो जान लेता ही समझ ही इसका नाम साधना ही
संशय को दूर कर काम, काम संशय को दूर करेगा, तो यह तो परस्पर एक का नाश
एक को कर, यह निर्णय मन द्वारा लिया गया!
सो इस बात का सार यह हुआ काम तो कर कर्म व अकर्म
अर्थात् फल वाले कर्म निष्काम कर्म को कर मत छोड़ो ना सोच कर काम मत रोक
मत मन को संशय ग्रसित रखो।
अज्ञानान्धकार मत पैदा करो, अज्ञान संशयवान मत बन कर्म को मत छोड़, कर्म
त्याग फल की इच्छा त्याग कर्म को ईश्वरार्पण समझ कर किया तो यह सब हो गया संशय
समाप्त हो, अज्ञान समाप्त हो, तो ही काम होगा फिर संशय ग्रसित काम क्या ही, कर्म कर्म
का फल ही ना हुआ व अकर्म का फल ना निष्काम संशय ग्रसित कर्म फल का ही देगा, जो
कर्म ज्ञान पर फल की इच्छा त्याग कर्म निष्काम कर्म बन गया तो ही मुक्ति का मार्ग
कर्म फलदाता बन कर, संशय अज्ञानान्ध को ही रूप व कर्म फल निष्काम संशय
त्याग
सो जो कहा ना संशय कर; संशय ग्रसित काम ना कर काम कर्म ना बन कर
व अकर्म, निष्काम कर्म ना बनेगा जो काम मन चित्त संशय से युक्त हो किया तो उस का
फल तो ना ही संशय ग्रसित रहा, ना संशय से युक्त निष्काम ही बनेगा व जब
कर्म का फल निष्काम नहीं तो कर्म मुक्ति का कारण ही कैसे बनेगा तो शंका तो
अज्ञान ग्रसित मन की उपज हुई जिस कारण संशय से संशय बढ़ता गया जो कर्म किया
उस का फल संशय युक्त ही संशय ग्रसित फल भोगना ही पड़ा; संशयवान् का नाश,
सो काम संशय युक्त ना हो संशय रहित कर्म, काम निष्काम, ना शंका ही ना फल
की; निष्काम भाव मन में संशय को स्थान नहीं देता सो ना संशयवान् बनो काम, मत
अकर्म करो ना, अकर्म त्याग कर्म को ना कर मत संशय युक्त बन कर, कर्म को
ईश्वरार्पण कर ईश्वर को मान ईश्वर पर छोड़ कर जो भी कर्म हो ईश्वर का ही नाम
जान कर संशय मिटा दिया तो ही, कर्म का त्याग हुआ और संशयरूपी अज्ञान का
विनाश हुआ और, ज्ञान द्वारा परमात्मा का ही रूप जान निष्काम कर्म किया
निष्काम फलदाता, परमात्मा ही परमात्मा स्वरूप प्रदान करता सो सब ही शांत हो
गया मन और
संशय अज्ञान, या संशय का कारण मन जब तक संशय को मानेगा तब, तो उस
बात का नाश सब काम सब का नाश ही! जब सब बात को संशय रूप मान कर उस
का त्याग ना तो त्याग ना ही फल का रूप बन पाया संशय अज्ञानांध बना रहा सब
बात का नाश तो हो गया संशय का नाश तब तक संभव ना हुआ; ना संशय
निवारण ही मन का विचार
जो संशयवान् मन ना उस बात का ही नाश कर दिया जो बात सब काम करने
ज्ञान का रूप थी ना ज्ञान अज्ञान का नाश हुआ ना ही, अज्ञान संशयवान् बना रहा
कर्म सब का नाश हो ही, संशय ही ना संशय रूप रहा तो ज्ञान संशय मिटा ही;
कर्म ज्ञान ही फल दाता ही; ज्ञान रूप ईश्वर ही फल
निष्काम ना फल की ना फल से सम्बंध ना कर्म त्याग की बात; ना दोष;
संशय ना संशय नाश ही है; कर्म योग-ज्ञान निष्काम कर्म रूप बन कर ज्ञान रूप
रहा, सं-शय नाश कर अज्ञान को; सं-शय न रहा; ज्ञान व कर्म एक--समान ही
रूप ज्ञान या परमात्मा रूप बन कर परमात्मा रूप हो गया तो सब संशयरूपी
माया अज्ञान व संशय
"कर्मणो ह्यपि बोद्ध व्यं, बोद्ध व्यं च वि कर्म णः, अकर्म णश्च बोद्ध व्यं--गह ना कर्म णो गतिः
इति श्रीमद् भगवद् गीता"
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