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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

. ४ . सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७७
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च ॥ २ ॥
न प्रतिपत्तिमात्रादव्यवस्थामात्राद्वा संशयः, किं तर्हि ? विप्रतिपत्तिमुपल-
भमानस्य संशयः । एवमव्यवस्थायामपीति । अथ वा—अस्त्यात्मेत्येके, नास्त्या-
त्मेत्यपरे मन्यन्ते—इत्युपलब्धेः कथं संशयः स्यादिति । तथोपलब्धिरव्यवस्थिता,
अनुपलब्धिश्चाव्यवस्थितेति विभागेनाध्यवसिते संशयो नोपपद्यत इति ॥ २ ॥
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः ॥ ३ ॥
यां च विप्रतिपत्तिं भवान् संशयहेतुं मन्यते, सा सम्प्रतिपत्तिः सा हि द्वयोः
प्रत्यनीकधर्मविषया । तत्र यदि विप्रतिपत्तेः संशयः, सम्प्रतिपत्तेरेव संशय
इति ॥ ३ ॥
अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः ॥ ४ ॥
न संशयः । यदि तावदियमव्यवस्था आत्मनि एव व्यवस्थिता ? व्यवस्थाना-
दव्यवस्था न भवतीत्यनुपपन्नः संशयः । अथ अव्यवस्थाऽऽत्मनि न व्यवस्थिता ?
विप्रतिपत्ति-अध्यवसाय या अव्यवस्था-अध्यवसाय से भी संशय नहीं होता ॥ २ ॥
अप्रतिपत्ति या अव्यवस्था के अध्यवसायमात्र से संशय नहीं होता, अपितु विप्रति-
पत्ति समझने वाले को संशय होता है । इसी तरह अव्यवस्था में समझें । अथवा—
'आत्मा है' यह एक मानते हैं, 'आत्मा नहीं है' यह दूसरे; यह उपलब्धि है तो इतने
से संशय कैसे होगी ? तथा जब उपलब्धि भी अव्यवस्थित है, अनुपलब्धि भी अव्यव-
स्थित है तब इस विभाग से अध्यवसित विषय के बारे में संशय कैसे कहला सकता
है ? ॥ २ ॥
विरुद्धकोटिद्वयज्ञान में भी सम्प्रतिपत्ति (निर्णय) के कारण संशय नहीं हो सकता ॥३॥
जिसको आप विप्रतिपत्ति ('आत्मा है, आत्मा नहीं है'—ऐसा विरुद्धकोटिद्वयज्ञान)
कहते हैं वह तो वस्तुतः सम्प्रतिपत्ति ही है; क्योंकि वह दो सम्प्रतिपत्तिविरुद्ध धर्मों को
विषय करती हुई अपने अपने विषय में निर्णय ही कराती है । वैसे स्थल में यदि आप
विप्रतिपत्ति के कारण संशय बतला रहे हैं तो वह सम्प्रतिपत्ति ने ही संशय बतला
रहे हैं ॥ ३ ॥
उपलब्धिव्यवस्था तथा अनुपलब्धिव्यवस्था से होनेवाला संशय भी उक्त अव्यवस्थाओं
के व्यवस्थित (निश्चित) होने से ॥ ४ ॥
संशय नहीं कहला सकता । यदि यह अव्यवस्था (सत्ता या असत्ता) अपने में अव-
स्थित है तो यह भी एक प्रकार की व्यवस्था ही है, इसे 'अव्यवस्था' कहकर संशयोप-
पादन नहीं कर सकते । और यदि यह अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित नहीं है तो
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