न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२०. सू० ] लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् . ७५
विपरीता कुत्सिता वा प्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिः । विप्रतिपद्यमानः पराजयं
प्राप्नोति । निग्रहस्थानं खलु पराजयप्राप्तिः ।
अप्रतिपत्तिस्त्वारम्भविषयेऽप्यारम्भः = परेण स्थापितं वा न प्रतिषेधति,
प्रतिषेधं वा नोद्धरति ।
असमासाच्च नैते एव निग्रहस्थाने इति ॥ १९ ॥
किं पुनर्दृष्टान्तवज्जातिनिग्रहस्थानयोरभेदः ? अथ सिद्धान्तवद्द्भेदः ?
इत्यत आह-
तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम् ॥ २० ॥
तस्य साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्, तयोश्च
विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वम् । नानाकल्पः = विकल्पः ।
विविधो वा कल्पः = विकल्पः । तत्राननुभाषणम्, अज्ञानम्, अप्रतिभा, विक्षेपः
मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षणम्-इत्यप्रतिपत्तिर्निग्रहस्थाम् । शेषस्तु विप्रतिपत्तिरिति॥
इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिता यथालक्षणं परीक्षिस्यन्त इति
त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्वेदितव्येति ॥ २० ॥
इति वात्स्यानीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ।
- समाप्तश्चायं प्रथमोऽध्यायः *
विपरीत या निन्दित प्रतिपादन 'विप्रतिपत्ति' होता है, इस तरह विप्रतिपद्यमान
पुरुष वाद में पराजय प्राप्त करता है । पराजय-प्राप्ति ही 'निग्रहस्थान' है ।
'अप्रतिपत्ति' उसे कहते हैं कि वादी आवश्यक विषय में भी आरम्भ न करे
अथवा प्रतिवादी द्वारा स्थापित पक्ष का खण्डन या मण्डन न करे । यहाँ द्वन्द्व समास न
करने में अभिप्राय यह है कि ये ही दो निग्रहस्थान नहीं हैं, अपितु अन्य भी हैं ॥ १९ ॥
क्या पूर्वोक्त 'दृष्टान्त' की तरह जाति और निग्रहस्थान में अभेद है या 'सिद्धान्त'
की तरह उनमें भेद है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं—
उनके अनेक विकल्पों के कारण जाति और निग्रहस्थान बहुत से हैं ॥ २० ॥
उस 'साधर्म्य वैधर्म्य से प्रतिषेध' रूप जाति के बहुत से विकल्प होने के कारण
जाति अनेक प्रकार की है । इसी तरह विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान के भी
अनेक विकल्प होने के कारण वह भी अनेक प्रकार का है । नाना या विविध कल्पनाएँ
जिसमें हों, वह 'विकल्प' कहलाता है । उनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप,
मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्य की उपेक्षा—ये अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान हैं, शेष विप्रतिपत्तिरूप
निग्रहस्थान हैं ॥
इन प्रमाणादि पदार्थों के उद्देश व लक्षण किये जा चुके; अब लक्षणानुसारी परीक्षा
आगामी अध्याय में की जायेगी—शास्त्र की यही त्रिधा प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥२०॥
वात्स्यायनीयन्यायभाष्यसहित न्यायदर्शन के प्रथमाध्याय का द्वितीयाह्निक समाप्त ॥
⁂ प्रथम अध्याय समाप्त ⁂
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