न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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उदाहरणेन समानस्य विपरीतस्य वा साध्यस्य धर्मस्य साधकभाववचनं हेत्वर्थः,
धर्मयोः साध्यसाधनभावप्रदर्शनमेकत्रोदाहरणार्थः, साधनभूतस्य धर्मस्य साध्येन
धर्मेण सामानाधिकरण्योपपादनमुपनयार्थः, उदाहरणस्थयोर्धर्मयोः साध्यसाधन-
भावोपपत्तौ साध्ये विपरीतप्रसङ्गप्रतिषेधार्थं निगमनम् ।
न चैतस्यां हेतूदाहरणपरिशुद्धौ सत्यां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य
विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वं प्रक्रमते । अव्यवस्थाप्य खलु धर्मयोः साध्य-
साधनभावमुदाहरणे जातिवादी प्रत्यवतिष्ठते । व्यवस्थिते तु खलु धर्मयोः
साध्यसाधनभावे दृष्टान्तस्थे गृह्यमाणे साधनभूतस्य धर्मस्य हेतुत्वेनोपादानम्;
न साधर्म्यमात्रस्य, न वैधर्म्यमात्रस्य वेति ॥ ३९ ॥
न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् [ ४०-४१ ]
तर्कलक्षणम्
इत ऊर्ध्वं तर्को लक्षणीय इति । अथेदमूच्यते—
अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः ॥ ४० ॥
अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे १ जिज्ञासा तावज्जायते—जानीयेममर्थमिति । अथ
जिज्ञासितस्य वस्तुनो व्याहतो धर्मौ विभागेन विमृशति—किंस्विदित्थम्, आहो-
प्रतिज्ञा का प्रयोजन है। उदाहरण के तुल्य या विपरीत साध्य धर्म के प्रति साधकत्व-
बोधन ही हेतु का प्रयोजन है । लिङ्ग-लिङ्गी की व्याप्ति को एक दृष्टान्त में बोधन
करना उदाहरण का प्रयोजन है । साधनभूत धर्म का साध्य धर्म से सामानाधिकरण्य
बतलाना उपनय का कार्य है । उदाहरण में मिले धर्मों का साध्य-साधनभाव बन जाने
पर साध्य में विपरीत प्रसङ्ग का निषेध बतलाना निगमन का प्रयोजन है ।
हेतु और उदाहरण का इतना स्पष्ट व्याख्यान कर देने पर वाद में साधर्म्य तथा
वैधर्म्य के प्रतिषेध से जातिनिग्रहस्थान का बाहुल्य नहीं हो पायेगा; उदाहरण में लिङ्ग-
लिङ्गी के धर्मों का साध्यसाधनभाव अनङ्गीकार करके जातिवादी प्रतिषेध का बाहुल्य
करता है । दृष्टान्तस्थ धर्मों का साध्यसाधनभाव व्यवस्थित ( प्रमित, शुद्ध ) रूप से स्वी-
कार कर लेने पर तो साधनभूत धर्म का ही हेतुरूप से ग्रहण होगा, न कि साधर्म्यमात्र या
वैधर्म्यमात्र के हेतुत्व का ॥ ३९ ॥
अवयनिरूपण के बाद तर्क का लक्षण दिखाना चाहिये, अतः अब उसे कहते हैं—
सम्यक्तया अविज्ञात अर्थ में कारणोपपत्ति द्वारा उसके तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा करना
'तर्क' कहलाता है ॥ ४० ॥
भली भाँति न जाने हुए अर्थ को जानने की इच्छा होती है—'इस अर्थ को जान लूँ'।
तदनन्तर उस जिज्ञासित वस्तु के विरुद्ध धर्मों पर विभागशः विचार करता है—'क्या यह
१. अविज्ञायमान०-पाठा० ।