न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ०
न्यायाश्रयसिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् [ २६-३१ ]
अथ सिद्धान्तः । इदमित्थम्भूतञ्चेत्यभ्यनुज्ञायमानमर्थजातं सिद्धम्, सिद्धस्य
संस्थितिः = सिद्धान्तः । संस्थितिः इत्थम्भावव्यवस्था, धर्मनियमः ।
स खल्वयम्—
तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः १ ॥ २६ ॥
तन्त्रार्थसंस्थितिः तन्त्रसंस्थितिः, तन्त्रम् = इतरेतराभिसम्बद्धस्यार्थसमूह-
स्योपदेशः, शास्त्रम् । अधिकरणानुषक्तार्थसंस्थितिरधिकरणसंस्थितिः, अभ्युपगम-
संस्थितिरनवधारितार्थपरिग्रहः, तद्विशेषपरीक्षणाय्याभ्युपगमसिद्धान्तः ॥ २६ ॥
तन्त्रभेदात्तु खलु—
स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थन्तरभावात् ॥ २७ ॥
तत्रेताश्चतस्रः संस्थितयोऽर्थान्तरभूताः ॥ २७ ॥
अब 'सिद्धान्त' का व्याख्यान करते हैं । 'यह ऐसा'—इस प्रकार स्वीक्रियमाण
अर्थसमूह 'सिद्ध' कहा जाता है, सिद्ध की संस्थिति 'सिद्धान्त' कहलाती है । 'संस्थिति'
से तात्पर्य है 'ऐसा ही होना चाहिये'–इस तरह की व्यवस्था, अर्थात् इस प्रकार का
निश्चय । प्रामाणिकतया स्वीक्रियमाण अर्थ की 'इदमित्थम्' इस व्यवस्था को 'सिद्धान्त'
कहते हैं । अर्थात् धर्मनियम भी वही है । वही यह—
शास्त्र, अधिकरण, अभ्युपगमभेद से विशेष परीक्षणार्थ स्वीकृत विषय (ज्ञानविशेष)
की इत्थम्भावव्यवस्था 'सिद्धान्त' कहलाती है ॥ २६ ॥
परस्पर सम्बद्ध अर्थसमूह का उपदेशक शास्त्र 'तन्त्र' कहलाता है । तन्त्रार्थ की
इत्थम्भावव्यवस्था 'तन्त्रसंस्थिति' कही जाती है, उसमें अधिकरणभेद से सम्बद्ध अर्थ
'अधिकरणसंस्थिति' कहलाता है । अनिश्चित अर्थ ( शास्त्र में साक्षात् अनुक्त, जैसे—
इस शास्त्र में मन का इन्द्रियत्व ) का परिग्रह 'अभ्युपगमसंस्थिति' कहलाता है । संक्षेप
में—मन आदि के विशेष अंश की परीक्षा के लिये अभ्युपगमसिद्धान्त माना जाता है ॥ २६ ॥
तन्त्रभेद से—
वह सिद्धान्त चार प्रकार का होता है—१. सर्वतन्त्रसंस्थिति, २. प्रतितन्त्रसंस्थिति,
३. अधिकरणसंस्थिति तथा ४. अभ्युपगमसंस्थिति ॥ २७ ॥
भेद करने पर संस्थिति ( सिद्धान्त ) के ये चार भेद ही बन सकते हैं ॥ २७ ॥
१. तन्त्र्यन्ते पदार्था अनेनेति तन्त्रं प्रमाणम्, तदधिकरणमाश्रयो ज्ञापकत्या येषां
पदार्थानामभ्युपगमो ज्ञानविशेषस्तस्य संस्थितिः 'इवमित्थमेव' इति व्यवस्थेति
सूत्राक्षरार्थः । तथा च तच्छास्त्रसिद्धोऽर्थः, तन्निश्चयो वा तच्छास्त्रसिद्धान्त इति
भावः ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri