न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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उपलब्धिव्यवस्थातः खल्वपि । सच्चोदकमुपलभ्यते तडागादिषु, मरीचिषु
चाविद्यमानमुदकमिति; अतः क्वचिदुपलभ्यमाने तत्त्वव्यवस्थापकस्य प्रमाण-
स्यानुपलब्धेः—‘किं सदुपलभ्यते, अथासत्’ इति संशयो भवति ।
अनुपलब्ध्यव्यवस्थातः । सच्च नोपलभ्यते मूलकीलकोदकादि, असच्चा-
नुत्पन्नं निरुद्धं वा; ततः क्वचिदनुपलभ्यमाने संशयः—‘किं सन्नोपलभ्यते, उता-
सत्’ इति संशयो भवति । विशेषापेक्षा पूर्ववत् ।
पूर्वः समानोऽनेकश्च धर्मो ज्ञेयस्थः, उपलब्ध्द्यनुपलब्धी पुनर्जातृस्थे—एतावता
विशेषेण पुनर्वचनम् । समानधर्माधिगमात् समानधर्मोपपत्तेर्विशेषस्मृत्यपेक्षो
विमर्श इति॥ २३ ॥
प्रयोजनलक्षणम्
स्थानवतां लक्षणमिति समानम् ।
४. उपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे—
तालाब आदि में जल है, और मिल जाता है, तथा मृगमरीचिका में जल नहीं है, परन्तु
भान होता है । इसलिये कहीं उपलब्धि होने पर तत्त्वनिर्णायक प्रमाण की उपलब्धि न
होने से 'क्या सत् ही मिलता है या असत् भी मिल जाता है'—ऐसा विमर्श भी 'संशय'
होता है ।
५. अनुपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । सत्
भी कभी कभी नहीं मिलता, जैसे—मन्त्रादि से कीलित या वस्त्रादि से आच्छादित जल ।
असत् तो मिलेगा ही क्या ! असत् द्विविध स्थिति में होता है—१. अनुत्पन्न या २. किसी
उपाय से छिपा हुआ । तब कहीं अनुपलब्धि होने पर संशय होता है कि क्या सत् उप-
लब्ध नहीं होता है, या असत् उपलब्ध नहीं होता ? यहाँ 'विशेषापेक्षा' का व्याख्यान
पहले लक्षण की तरह ही समझ लेना चाहिये ।
'संशय' के इन पाँच हेतुओं में से प्रथम और द्वितीय ('समान....' और 'अनेक....')
ज्ञेय में घटेंगे तथा तथा चतुर्थ और पंचम ('उपलब्धि....' 'अनुपलब्धि....') ज्ञाता में ।
इसी भेद को बताने के लिये ये पुनः कहे गये हैं ।
"समानधर्म के अधिगम से, समानधर्म की उपपत्ति से विशेष स्मृत्यपेक्षावान् विमर्श
'संशय' कहलाता है"—यह संशय का निष्कृष्ट लक्षण है ॥ २३ ॥
क्रमशः अवसर आने पर ही 'प्रयोजन' का लक्षण-कथन अभीष्ट था, अब उसका
अवसर आ गया है ।
१. अत्र वार्त्तिककारः—'समानधर्मोपपत्तेः, अनेकधर्मोपपत्ते', विप्रतिपत्तेश्च त्रिविध
एव संशयः' इत्याह । विस्तरस्तु तत एवावगन्तव्यः ।
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