न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३७
असंवेदने चाविद्यमानेनाविशेषः । यदि धर्मक्षयात् संवेदनोपरमो नित्यं सुखं
न संवेद्यत इति ? किं विद्यमानं न संवेद्यते, अथाविद्यमानम् ? —इति नानुमानं
विशिष्टेऽस्तीति ।
अप्रक्षयश्च धर्मस्य निरनुमानमुत्पत्तिधर्मकत्वात् । योगसमाधिजो धर्मो न
क्षीयत इति नास्त्यनुमानम् । उत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति विपर्ययस्य त्वनुमानम् ।
यस्य तु संवेदनोपरमो नास्ति तेन संवेदनहेतुर्नित्य इत्यनुमेयम् ।
नित्ये च मुक्तसंसारस्थयोरविशेष इत्युक्तम् । यथा मुक्तस्य नित्यं सुखं
तत्संवेदनहेतुश्च, संवेदनस्य तूपरमो नास्ति; कारणस्य नित्यत्वात्, तथा संसार-
स्थस्यापीति । एवं च सति धर्माधर्मफलेन सुखदुःखसंवेदनेन साहचर्यं गृह्येतेति ।
शरीरादिसम्बन्धः प्रतिबन्धहेतुरिति चेत् ? न; शरीरादीनामुपभोगार्थत्वात्,
विपर्ययस्य चाननुमानात् ।
स्यान्मतम्—संसारावस्थस्य शरीरादिसम्बन्धो नित्यसुखसंवेदनहेतोः
प्रतिबन्धकः, तेनाविशेषो नास्तीति ? एतच्चायुक्तम्; शरीरादय उपभोगार्थाः,
ते भोगप्रतिबन्धं करिष्यन्तीत्यनुपपन्नम्; न चास्त्यनुमानम्—'अशरीरस्यात्मनो
भोगः कश्चिदस्ति' इति ।
'सुख है, परन्तु धर्मक्षय से उसका संवेदन नहीं हो पाता'—ऐसा मानेंगे तो इसमें
तथा 'सुख नहीं है'—इसमें कोई अन्तर नहीं ।
'उत्पत्तिधर्मा होने से वह धर्म क्षीण नहीं होता' ऐसा अनुमान भी नहीं कर सकते;
अपितु 'उत्पत्तिधर्मा अनित्य होता है' ऐसा विपरीत अनुमान ही होता है । हाँ, ऐसा
कोई पुरुष हो जिसे संवेदनोपरम कभी न हो पाये वह यदि अनुमान करे कि 'संवेदन
हेतु नित्य है' तो बात बन सकती है, परन्तु ऐसा पुरुष मिलेगा कहाँ !
अथ च—संवेदनहेतु के नित्य मानने पर मुक्त और संसारी पुरुष में अन्तर नहीं
रहेगा—वह हम पहले ही कह आये । जैसे मुक्त पुरुष के सुख तथा सुखसंवेदन कारण
के नित्य होने से नित्य हैं; क्योंकि वहाँ सुखसंवेदनोपरम नहीं होता, ऐसी स्थिति में
संसारी में सुख तथा सुखसंवेदन भी मानना पड़ेगा । ऐसा मानने पर धर्म तथा अधर्म
से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धि-काल में नित्य सुख तथा उसके नित्य संवेदन का यौग-
पद्य भी मानना पड़ेगा ।
यदि कहें—'उस संवेदन में शरीरादिसम्बन्ध प्रतिबन्धहेतु है' ? शरीरादि तो उस
सुख के उपभोग के लिये होते हैं, वे प्रतिबन्धक क्यों बनेंगे ! 'शरीर उपभोगहेतु नहीं है'—
ऐसा अनुमान करना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वह शास्त्रविरुद्ध होगा ।
कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि संसारावस्थापन्न मुक्त पुरुष का शरीरादिसम्बन्ध
नित्य सुखसंवेदन हेतु का प्रतिबन्धक है, इसलिये संसारी और मुक्तपुरुष के सुखसंवेदन