न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३
विद्यानिर्वेदादिभिश्च परेणावज्ञायमानस्य—
ताभ्यां विगृह्य कथनम् ॥ ५१ ॥
विगृह्य इति विजिगीषया, न तत्त्वबुभुत्सयेति । तदेतद् विद्यापालनार्थम्, न
लाभपूजाख्यात्यर्थमिति ॥ ५१ ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकं समाप्तम्
❀ समाप्तश्च चतुर्थोऽध्यायः ❀
या जो प्रतिवादी मिथ्याज्ञानावलेपदुर्विदग्धता से जिज्ञासु की अवज्ञा करने को
तत्पर हो, उस समय जिज्ञासु
जल्प-वितण्डा से संवाद करता हुआ विजिगीषा से तत्त्वकथन करे ॥ ५१ ॥
‘विगृह्य’ पद का तात्पर्य है विजिगीषा से, न कि तत्त्वबुभुत्सा से । जल्प-वितण्डा
का प्रयोग इसलिये किया जाता है कि वे उक्त दुर्विदग्ध वादी अपना दृढ प्रतिपक्षी न
न पाकर साधारण जनता के हृदय से धार्मिक भावनाओं का विलोप ही न कर दें ।
वहाँ जिज्ञासु को यह कभी न सोचना चाहिये कि इस जल्प-वितण्डा के प्रयोग से सत्कार,
या धन का लाभ होगा, अपितु वह विद्या की रक्षा के लिये जल्प-वितण्डा का आश्रयण
लेता रहे ॥ ५१ ॥
वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में चतुर्थ अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त
❀ चतुर्थ अध्याय भी समाप्त ❀