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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 410 में से

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पृष्ठ 340

३२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
न चावयव्यवयवाः ? ॥ १० ॥
न चावयवानां धर्मोऽवयवी । कस्मात् ? धर्ममात्रस्य धर्मिभिरवयवैः
पूर्ववत् सम्बन्धानुपपत्तेः । पृथक् चावयवेभ्यो धर्मिभ्यो धर्मस्याग्रहणादिति
समानम् ॥ १० ॥
एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेरप्रश्नः ॥ ११ ॥
किं प्रत्यवयवं कृत्स्नोऽवयवी वर्त्तते, अथैकदेशेन ? इति नोपपद्यते प्रश्नः ।
कस्मात् ? एकस्मिन् भेदाभावाद् भेदशब्दप्रयोगानुपपत्तेः । 'कृत्स्नम्' इत्यनेकस्या-
शेषाभिधानम्, 'एकदेशः' इति नानात्वे कस्यचिदभिधानम्—ताविमौ कृत्स्नैक-
देशशब्दौ भेदविषयौ नैकस्मिन्नवयविन्युपपद्येते; भेदाभावादिति ॥ ११ ॥
'अन्यावयवाभावान्नैकदेशेन वर्त्तते' इत्यहेतुः
अवयवान्तरभावेऽप्यवृत्तेरहेतुः ॥ १२ ॥
अवयवान्तरभावादिति । यद्यप्येकदेशोऽवयवान्तरभूतः स्यात्, तथाप्यवयवे-
ऽवयवान्तरं वर्त्तत नावयवीति । अन्योऽवयवीति अन्यावयवभावेऽप्यवृत्तेर-
'अवयवों का धर्ममात्र हो अवयवी हैं'—यह मत भी युक्त नहीं ? ॥ १० ॥
'अवयवों का धर्म' भी अवयवी नहीं है; क्योंकि धर्ममात्र अवयवी का धर्मी अवयवों
से किसी भी तरह पूर्ववत् कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता । और धर्मी अवयवों से धर्म का
पृथक् ग्रहण नहीं हुआ करता, अन्यथा वह नित्य होने लगेगा ? ॥ १० ॥
सिद्धान्ती उत्तर देता है—
एक अवयवी में भेद न होने के कारण 'भेद' शब्द प्रयोग अयुक्त होने से आपका
प्रश्न नहीं बनता ॥ ११ ॥
'क्या प्रत्येक अवयव में अवयवी रहता है, या एकदेश में ?' यह प्रश्न उचित नहीं;
क्योंकि एक में भेद न होने से भेद ( पार्थक्य ) वाचक शब्द का प्रयोग अनुचित है ।
क्योंकि 'कृत्स्न' ( समग्र )—यह अनेक होते हुए अशेष का बोधन करता है, 'एकदेश'
यह भी अनेक में एक का बोधन करता है । अर्थात् ये 'कृत्स्न' तथा 'एकदेश' शब्द
भिन्न वस्तु के बोधक हैं, अतः एक अवयवी में उपपन्न नहीं होते; क्योंकि उनमें भेद
नहीं है ॥ ११ ॥
'परिमाण भेद होने के कारण अवयवी में अवयव न रहने से अवयवान्तर भी न होने
से अवयवी एकदेश में नहीं रहता'—यह भी अहेतु है ।
अवयवान्तर होने पर भी उसमें अवयवी के न रहने से वह अहेतु है ॥ १२ ॥
अवयवान्तर होने से । यद्यपि अवयवी एकदेशेन अवयवान्तर में रह सकता है तो भी
अवयव में अवयवान्तर ही रहेगा, अवयवी नहीं । 'अवयवी अन्य है, अवयव अन्य, अतः
वह अवयवों से गृहीत नहीं होता, यों अन्यावयव न होने से वह एकदेश से गृहीत नहीं