न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ]
अथेदानीमर्थं निराकरिष्यताऽवयव्युपपाद्यते—
विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् संशयः ? ॥ ४ ॥
सदसतोरुपलम्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलम्भादविद्यापि द्विविधा । उप-
लभ्यमानेऽवयविनि विद्याद्वैविध्यात् संशयः, अनुपलभ्यमाने चाविद्याद्वैविध्यात्
संशयः । सोऽयमवयवी यद्युपलभ्यते, अथापि नोपलभ्यते—न कथञ्चन संशयान्मु-
च्यते इति ? ॥ ४ ॥
तदसंशयः; पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥
तस्मिन्ननुपपन्नः संशयः । कस्मात् ? पूर्वोक्तहेतूनामप्रतिषेधादस्ति द्रव्या-
न्तरारंभ इति ॥ ५ ॥
वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ? ॥ ६ ॥
संशयानुपपत्तिर्नास्त्यवयवीति ? ॥ ६ ॥
तद्विभजते—
पूर्वोक्त निमित्त-अनुव्यञ्जन संज्ञाओं का अवयवी ही विषय है, उन संज्ञाओं में से
कतिपय के परिवर्जन के लिये 'अशुभ संज्ञा' का उपदेश किया गया । अब विज्ञानवादी
बौद्ध के मत में जब अर्थमात्र नहीं है तो अवयवी तथा तदाश्रित उक्त संज्ञाएँ कहाँ
होंगी ! अतः वह अर्थ का खण्डन करना चाहता हुआ पहले अवयवी का निराकरण कर
रहा है—
विद्या, अविद्या के द्वैविध्य से संशय होता है ? ॥ ४ ॥
सत्, असत् की उपलब्धि से विद्या दो प्रकार की है। सत्, असत् की अनुपलब्धि से
अविद्या भी दो प्रकार की है। अवयवी के उपलब्ध होने पर विद्याद्वैविध्य से संशय
होता है ! तथा उसके अनुपलब्ध रहने पर अविद्याद्वैविध्य से भी संशय होगा । इस
तरह यह अवयवी भले ही उपलब्ध होता हो या न उपलब्ध होता हो—किसी भी तरह
संशय से मुक्त नहीं होता ॥ ४ ॥
पूर्व हेतु की सिद्धि से संशय उपपन्न नहीं है ॥ ५ ॥
उस अवयवी में संशय नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त हेतुओं से अवयवी के बारे में सिद्धि
की जा चुकी है कि अवयवी द्रव्यान्तर से आरब्ध होता है। ऐसा सिद्ध हो जाने के बाद
उसमें संशय क्यों होगा ! ॥ ५ ॥
(हमारा भी यही कहना है कि) सत्तानुपपत्ति से भी उसमें संशय नहीं है ? ॥ ६ ॥
विज्ञानवादी ( बौद्ध ) प्रतिबन्दी उत्तर देता है—हमारा भी यही कहना है कि वहाँ
संशय नहीं होता; क्योंकि अवयवी की सत्ता ही सिद्ध नहीं होती ? ॥ ६ ॥
इसी का वह (विज्ञानवादी) उपपादन करता है—