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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

३१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
'अनादिश्च क्लेशसन्ततिः' इत्यप्युक्तम्, सर्वे इमे खल्वाध्यात्मिका भावा
अनादिना प्रबन्धेन प्रवर्त्तन्ते शरीरादयः । न जात्वत्र कश्चिदनुत्पन्नपूर्वः प्रथमत
उत्पद्यतेऽन्यत्र तत्त्वज्ञानात् । न चैवं सत्यनुत्पत्तिधर्मकं किञ्चिद्व्ययधर्मकं प्रतिज्ञा-
यते इति । कर्म च सत्त्वनिकायनिर्वर्तकं तत्त्वज्ञानकृतान्मिथ्यासङ्कल्पविधातान्न
रागाद्युत्पत्तिनिमित्तं भवति, सुखदुःखसंवित्तिफलं तु भवतीति ॥ ६८ ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्यायस्याद्यमाह्निकम् ।
•
[ द्वितीयमाह्निकम् ]
तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् [ १-३ ]
किं नु खलु भोः ! यावन्तो विषयास्तावत्सु प्रत्येकं तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते ? अथ
क्वचिदुत्पद्यत इति ? कश्चात्र विशेषः ? न तावदेकैकत्र यावद्विषयमुत्पद्यते; ज्ञेया-
नामानन्त्यात् । नापि क्वचिदुत्पद्यते, यत्र नोत्पद्यते तत्रानिवृत्तो मोह इति मोह-
शेषप्रसङ्गः । न चान्यविषयेण तत्त्वज्ञानेनान्यविषयो मोहः शक्यः प्रतिषेद्धुमिति ?
मिथ्याज्ञानं वै खलु मोहो न तत्त्वज्ञानस्यानुत्पत्तिमात्रम् । तच्च मिथ्याज्ञानं
'क्लेशसन्तति अनादि हैं'—यह भी आपने कहा । इतना ही नहीं, सभी आध्यात्मिक
शरीरादि भाव अनादिप्रवाह से प्रवर्त्तमान हैं। ऐसा इनमें आज कोई पहली बार उत्पन्न
नहीं हुआ जो पहले कभी उत्पन्न न हुआ हो, केवल तत्त्वज्ञान को छोड़ कर । इसका
यह अर्थ नहीं कि अनुत्पत्तिधर्मक भाव भी निवृत्त होता है । अपि तु प्राणिशरी-
रोत्पादक कर्म तत्त्वज्ञानकृत मिथ्यासङ्कल्पनाश से रागादि की उत्पत्ति में कारण नहीं
बनता । हाँ, तत्त्वज्ञान होने पर भी सुखदुःखसंवेदन फल तो होता ही रहता है ॥ ६८ ॥
वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में चतुर्थाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त
•
क्यों जी, हम पूछते हैं कि जितने विषय हैं उनमें से व्यक्तिशः प्रत्येक का तत्त्वज्ञान
उत्पन्न होता है या किसी एक व्यक्ति का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ? इसमें अन्तर क्या
आयेगा ? विषय के अनुसार एक-एक का ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं, कहाँ
तक पार पाइयेगा । किसी एक व्यक्ति के तत्त्वज्ञानोत्पाद से कोई लाभ नहीं; क्योंकि
जहाँ वह उत्पन्न नहीं हुआ वहां मोह रह ही जायेगा तो मोह फिर भी शेष रह गया ।
यह कैसे हो सकता है कि अन्यविषयक तत्त्वज्ञान से अन्यविषयक मोह निवृत्त हो जाये !
मिथ्याज्ञान को मोह कहते हैं, न कि तत्त्वज्ञान की अनुत्पत्तिमात्र को । मिथ्याज्ञान जिस