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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 410 में से

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पृष्ठ 320

३०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०
'बाधनालक्षणं दुःखम्' (१.१.२१) इत्युक्तम्, ऋषिभिर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते ।
अत्र च हेतुरुपादीयते—
विविधबाधनायोगाद् दुःखमेव जन्मोत्पत्तिः ॥ ५५ ॥
जन्म = जायते इति, शरीरेन्द्रियबुद्धयः, शरीरादीनां च संस्थानविशिष्टानां
प्रादुर्भाव उत्पत्तिः। विविधा च बाधना-हीना, मध्यमा, उत्कृष्टा चेति। उत्कृष्टा
नारकिणाम्, तिरश्चां तु मध्यमा, मनुष्याणां तु हीना, देवानां हीनतरा वीत-
रागाणां च। एवं सर्वमुत्पत्तिस्थानं विवधबाधनानुषक्तं पश्यतः सुखे तत्साधनेषु
च शरीरेन्द्रियबुद्धिषु दुःखसंज्ञा व्यवतिष्ठते । दुःखसंज्ञाव्यवस्थानात् सर्वलोकेष्वन-
भिरतिसंज्ञा भवति। अनभिरतिसंज्ञामुपासीनस्य सर्वलोकविषया तृष्णा विच्छि-
द्यते, तृष्णाप्रहाणात् सर्वदुःखाद्विमुच्यते इति । यथा विषयोगात् पयो विषमिति
बुध्यमानो नोपादत्ते, अनुपाददानो मरणदुःखं नाप्नोति ॥ ५५ ॥
दुःखोद्देशस्तु न सुखस्य प्रत्याख्यानम्, कस्मात् ?
न; सुखस्याप्यन्तरालनिष्पत्तेः ॥ ५६ ॥
न खल्वयं दुःखोद्देशः सुखस्य प्रत्याख्यानम् । कस्मात् ? सुखस्याप्यन्तराल-
सभी को पीड़ा देते हैं, अतः दुःख हैं'—यों यह ऋषियों द्वारा दुःखसंज्ञाभावना के रूप में
उपदिष्ट किया है। यहाँ हेतु देते हैं—
विविध बाधायुक्त होने से शरीरादि की उत्पत्ति दुःख है ॥ ५५ ॥
जन्म अर्थात् जो उत्पन्न हो, जैसे—शरीर, इन्द्रिय तथा बुद्धि । संस्थानविशिष्ट
शरीरादि का प्रादुर्भाव 'उत्पत्ति' कहलाता है। हीन, मध्यम तथा उत्कृष्ट भेद से दुःख
अनेक प्रकार का है। इनमें उत्कृष्ट दुःख नरकवासकाल में मिलता है, मध्यम दुःख पशु
योनि में तथा हीन ( अल्प ) दुःख मनुष्य योनि में मिलता है। देवयोनि में तथा वीतराग
ज्ञानियों में यह दुःखमात्रा अल्पतर होती है। इस प्रकार सभी उत्पत्तिस्थान ( योनियों )
को दुःखानुपक्त समझते हुए जिज्ञासु की सुख के साधन तथा जायमान शरीर, इन्द्रिय
तथा बुद्धि में दुःखबुद्धि बन जाती है। इनमें दुःखबुद्धि बन जाने से समग्र चराचर जगत्
को दुःख रूप समझ कर जिज्ञासु उससे विरक्त हो जाता है। इस विराग-भावना का
अभ्यास करने से उसकी सार्वत्रिकी तृष्णा विच्छिन्न हो जाती है। तृष्णानाश से वह सभी
दुःखों से छुटकारा पा जाता है। वह समझता है कि जैसे विषसम्पृक्त दुग्ध विषवत् कार्य
करता है उसी तरह यह दुःखसम्पृक्त सुख भी दुःख ही है, अतः उसकी प्राप्ति के लिये
प्रयास नहीं करता; उक्त प्रयास न करने से वह मरणदुःख नहीं पाता ॥ ५५ ॥
उद्देशसूत्र (१.१.९) में दुःख की गणना सुखप्रत्याख्यान के रूप में नहीं की गयी है—
बीच-बीच में सुख की भी उत्पत्ति होने से यह सुख का प्रत्याख्यान नहीं है ॥५६॥
यह दुःखपरिगणन सुख का निषेध नहीं हैं; क्योंकि इस दुःखप्रवाह में बीच-बीच में