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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

४०. सू० ] सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् २९५
न स्वभावसिद्धिः, आपेक्षिकत्वात् ? ॥ ३९ ॥
अपेक्षाकृतमापेक्षिकम् । ह्रस्वापेक्षाकृतं दीर्घम्, दीर्घापेक्षाकृतं ह्रस्वम्; न
स्वेनात्मनावस्थितं किञ्चित् । कस्मात् ? अपेक्षासामर्थ्यात् । तस्मान्न स्वभाव-
सिद्धिर्भावानामिति ॥ ३९ ॥
व्याहतत्वादयुक्तम् ॥ ४० ॥
यदि ह्रस्वापेक्षाकृतं दीर्घम्, ह्रस्वमनापेक्षिकम्; किमिदानीमपेक्ष्य ह्रस्वमिति
गृह्यते ? अथ दीर्घापेक्षाकृतं ह्रस्वम्, दीर्घमनापेक्षिकम्; किमिदानीमपेक्ष्य दीर्घ-
मिति गृह्यते ? एवमितरेतराश्रययोरेकाभावेऽन्यतराभावादुभयाभाव इति दीर्घा-
पेक्षाव्यवस्थाऽनुपपन्ना । स्वभावसिद्धावसत्यां समयोः परिमण्डलयोर्वा द्रव्ययोरा-
पेक्षिके दीर्घत्वह्रस्वत्वे कस्मान्न भवतः ? 'अपेक्षायामनपेक्षायां च द्रव्ययोरभेदः ।
यावती द्रव्ये अपेक्षमाणे तावती एवानपेक्षमाणे, नान्यतरत्र भेदः । आपेक्षिकत्वे
तु सत्यन्यतरत्र विशेषोपजनः स्यादिति ।
किमपेक्षासामर्थ्यमिति चेत् ? द्वयोर्ग्रहणेऽतिशयग्रहणोपपत्तिः । द्वे द्रव्ये
पश्यन्नेकत्र विद्यमानमतिशयं गृह्णाति तद् दीर्घमिति व्यवस्यति, यच्च हीनं
शून्यवादी फिर आक्षेप करते हैं—
सभी भावों के आपेक्षिकत्व होने से स्वभावसिद्धि नहीं बनती ॥ ३९ ॥
'आपेक्षिक' अर्थात् अपेक्षा कृत । दीर्घ में दीर्घत्व ह्रस्वापेक्षा है, तथा ह्रस्व में
ह्रस्वत्व दीर्घापेक्षया । वस्तुतः दोनों में स्वयं दीर्घह्रस्व-भाव नहीं हैं; क्योंकि दोनों ही
एक दूसरे की अपेक्षासामर्थ्य रखते हैं । अतः यह मानना चाहिए कि सभी भावों की
सत्ता आपेक्षिकी है, वास्तव में वे अभाव ही हैं ? ॥ ३९ ॥
व्याघात दोष से आपेक्षिकत्व हेतु नहीं बनता ? ॥ ४० ॥
यदि ह्रस्वापेक्षया दीर्घ है तो 'ह्रस्व अनापेक्षिक हो गया, यह ह्रस्व अब किसकी
अपेक्षा से 'ह्रस्व' कहलायेगा ! एवमेव दीर्घापेक्षया ह्रस्व है तो दीर्घ अनापेक्षिक हो
गया, यह दीर्घ अब किसकी अपेक्षा से 'दीर्घ' कहलायेगा ! इस तरह, अन्योन्याश्रय दोष
से एक का अभाव होने पर दूसरे के न होने से दोनों का ही अभाव होने लगेगा—यों
आपकी यह अपेक्षाव्यवस्था अनुपपन्न ही रहेगी ।
अथ च, स्वभावसिद्धि न मानोगे तो बताइये कि समान आकार वाले दो द्रव्यों में
आपेक्षिक ह्रस्वस्व-दीर्घत्व क्यों नहीं बनते ? अपितु अपेक्षा होने या न होने से भी द्रव्यों
में अभेद होना चाहिए । जितनी मात्रा में दोनों द्रव्य अपेक्षा रखते हैं उतनी ही मात्रा में
दोनों अपेक्षा नहीं रखते । उन्हें आपेक्षिक मानने पर उनमें से भी किसी एक की विशेषता
माननी ही होगी, जब कि वस्तुतः होती नहीं ।
आपके मत में यह अपेक्षासामर्थ्य क्या है ? दो के ग्रहण में किसी एक में अतिशय