न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३. सू० ] प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५
प्रवर्त्तन्ते; मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तत्त्वज्ञानात्, तन्निवृत्तौ रागद्वेषप्रबन्धोच्छेदेऽपवर्ग
इति प्रादुर्भावतिरोधानधर्माणः—इत्येवमाद्युक्तं दोषाणामिति ॥ २ ॥
दोषत्रैराश्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ३-८ ]
‘प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः’ ( १. १. १८ ) इत्युक्तम्, तथा चेमे मानेर्ष्यासूया-
विचिकित्सामत्सरादयः, ते कस्मान्नोपसङ्ख्यायन्ते ? इत्यत आह—
तत्त्रैराश्यं रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् ॥ ३ ॥
तेषां दोषाणां त्रयो राशयः, त्रयः पक्षाः । रागपक्षः—कामो मत्सरः स्पृहा
तृष्णा लोभ इति; द्वेषपक्षः—क्रोध ईर्ष्या असूया द्रोहोऽमर्ष इति; मोहपक्षः—
मिथ्याज्ञानं विचिकित्सा मानः प्रमाद इति; त्रैराश्यान्नोपसंख्यायन्ते इति ।
लक्षणस्य तर्ह्यर्थभेदात्त्रित्वमनुपपन्नम् ? रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात् नानुप-
पन्नम् । आसक्तिलक्षणो रागः, अमर्षलक्षणो द्वेषः, मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणो मोह
इति । एतत्प्रत्यात्मवेदनीयं सर्वशरीरिणाम् । विजानात्ययं शरीरी रागमुत्पन्नम्—
से प्रवृत्त होते रहते हैं । (यों दोष प्रादुर्भाव-धर्म वाले हैं । उधर) तत्त्वज्ञान से मिथ्या-
ज्ञान की निवृत्ति होती है, मिथ्याज्ञान-निवृत्ति से रागद्वेषसन्तति की उच्छेद हो जाता
है, इस उच्छेद हेतु से अपवर्ग हो जाता है ! इस तरह दोष प्रादुर्भाव-विनाशवाले हैं ।
प्रसङ्ग-प्रसङ्ग (१. १. २, १. १. १८, ३. १. २५) पर जो कुछ दोषों के बारे में कहा
जा चुका है वह सब इनकी परीक्षा ही समझी जानी चाहिये ॥ २ ॥
पीछे आप कह आये हैं कि 'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' (१. १. १८) तो जब मान,
ईर्ष्या, असूया, विचिकित्सा, मत्सर-आदि भी प्रवृत्ति के हेतु हैं; फिर इनकी गणना क्यों
नहीं की गयी ? इस पर कहते हैं—
राग, द्वेष तथा मोह—इस भेद से उस दोष के तीन समूह हैं ॥ ३ ॥
उन दोषों तीन राशियां, तीन वर्ग हैं । १. रागपक्ष में, जैसे—काम, मत्सर, स्पृहा,
तृष्णा तथा लोभ—इनका परिगणन होता है । २. द्वेषपक्ष में, जैसे—क्रोध, ईर्ष्या,
असूया, द्रोह तथा अमर्ष (—इनका परिगणन होता है) । ३. मोहपक्ष में, जैसे—मिथ्या-
ज्ञान, विचिकित्सा, मान तथा प्रमाद ( —इनका परिगणन होता है ) । इस त्रिराशि के
कारण ही उक्त सब का परिगणन नहीं किया गया ।
इस तरह तो लक्षण का भेद न होने से उक्त बहुविधत्व की तरह त्रित्व भी नहीं
बनेगा ? क्यों नहीं बनेगा, जब कि राग द्वेष तथा मोह में अर्थभेद है । राग कहते हैं
वस्तु में आसक्ति को । द्वेष कहते हैं किसी वस्तु में असहिष्णुतारूप अमर्ष को । तथा
मोह मिथ्याज्ञान कहलाता है । यह प्राणी, जब इसे राग उत्पन्न होता है तो जानता है कि
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