न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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सर्वं सर्वात्मनां प्रसज्येत ! न त्विदमित्थम्भूतं जन्म, तस्मान्नाकर्मनिमित्ता शरी-
रोत्पत्तिरिति ।
उपपन्नश्च तद्वियोगः, कर्मक्षयोपपत्तेः । कर्मनिमित्ते शरीरसर्गे तेन शरीरे-
णात्मनो वियोग उपपन्नः । कस्मात् ? कर्मक्षयोपपत्तेः । उपपद्यते खलु कर्मक्षयः ।
सम्यग्दर्शनात् प्रक्षीणे मोहे वीतरागः पुनर्भवहेतु कर्म कायवाङ्मनोभिर्न करोति
इत्युत्तरस्यानुपचयः, पूर्वोपचितस्य विपाकप्रतिसंवेदनात्प्रक्षयः । एवं प्रसवहेतोर-
भावात् पतितेऽस्मिन् शरीरे पुनः शरीरान्तरानुपपत्तेरप्रतिसन्धिः । अकर्मनिमित्ते
तु शरीरसर्गे भूतक्षयानुपपत्तेस्तद्वियोगानुपपत्तिरिति ॥ ६७ ॥
तददृष्टकारितमिति चेत्१ ? पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे ॥ ६८ ॥
'अदर्शनं खल्वदृष्टमित्युच्यते अदृष्टकारिता भूतेभ्यः शरीरोत्पत्तिः । न जात्व-
नुत्पन्ने शरीरे द्रष्टा निरायतनो दृश्यं पश्यति, तच्चास्य दृश्यं द्विविधम्-विषय-
श्च, नानात्वं चाव्यक्तात्मनोः; तदर्थः शरीरसर्गः । तस्मिन्नवसिते चरितार्थानि
होने लगेगा । जबकि ऐसा लोक में देखा नहीं जाता । अतः मानना पड़ेगा कि शरीरो-
त्पत्ति कर्मनिमित्तक ही है ।
इस सिद्धान्त से, तन्निमित्तक कर्मों के क्षीण होने पर उस शरीर का नाश भी
सम्भव है । जब हम कर्मनिमित्तकशरीरसृष्टिसिद्धान्त मान लेते हैं तो उस सिद्धान्त से
'एक न एक दिन शरीर-आत्मा का वियोग' भी सिद्ध है; क्योंकि जिन कर्मों से वह शरीर
उत्पन्न हुआ, वे कभी न कभी तो क्षीण होंगे ही, उस दिन उक्त वियोग सम्भव है । कर्म
क्षीण होते हैं—यह बात युक्ति से भी समझ में आ जाती है । क्योंकि प्रमाणादि पदार्थों
के तत्त्वज्ञान से अज्ञान (मोह) के नष्ट होने पर तन्मूलक राग दूर हो जाता है, राग के
दूर होने पर पुनरुत्पत्तिकारण त्रिविध (शरीर वाणी या मन से) कर्म नहीं होते कि
जिनके उपभोग के लिए पुनः शरीरोत्पत्ति हो, यों आगामी कर्म बनेंगे नहीं, पिछलों का
उपभोग से क्षय हो चुका । इस प्रकार, उत्पत्तिहेतु के न रहने से वर्तमान शरीर के
विनष्ट होने पर पुनः शरीरान्तरोत्पाद में प्रतिसन्धान नहीं होगा । अकर्मनिमित्तक
शरीर सृष्टि मानने पर भूतों के क्षीण न होने से शरीरपरम्परा कभी रुकेगी नहीं तो
आपके (सांख्य के) मत में अपवर्ग कैसा ! ॥ ६७ ॥
वह शरीरवियोग अदृष्टकारित है, ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि यों तो अपवर्ग
के बाद भी अदृष्टवशात् पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी ॥ ६८ ॥
शङ्का—'अदृष्ट' से तात्पर्य है 'अदर्शन' । भूतों से शरीरोत्पत्ति अदृष्टवश होती है;
क्योंकि बिना शरीर के उत्पन्न हुए अधिष्ठान के बिना द्रष्टा (पुरुष) दृश्य को देखेगा
कैसे ! इसका यह दृश्य दो प्रकार का है—१. दृश्य, तथा २. अव्यक्त व आत्मा का
१. एतावत्पर्यन्तं भाष्यान्तर्गतं क्वचित्पुस्तके ।