न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५५. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५९
त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य केशनखादिष्वप्रसङ्गः ॥ ५२ ॥
इन्द्रियाश्रयत्वं शरीरलक्षणम् । त्वक्पर्यन्तं जीवमनःसुखदुःखसंवित्त्यायतन-
भूतं शरीरम्, तस्मान्न केशादिषु चेतनोत्पद्यते । अर्थकारितस्तु शरीरोपनिबन्धः
केशादीनामिति ॥ ५२ ॥
३. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना;
शरीरगुणवैधर्म्यात् ॥ ५३ ॥
द्विविधः शरीरगुणः—अप्रत्यक्षश्च गुरुत्वम्, इन्द्रियग्राह्यश्च रूपादिः। विधान्तरं
तु चेतना—नाप्रत्यक्षा संवेद्यत्वात्, नेन्द्रियग्राह्या मनोविषयत्वात्। तस्माद् द्रव्या-
न्तरगुण इति ॥ ५३ ॥
न; रूपादीनामितरेतरधर्म्यात् ? ॥ ५४ ॥
यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न शरीरगुणत्वं जहति, एवं रूपादिद्वैधर्म्या-
च्चेतना शरीरगुणत्वं न हास्यतीति ? ॥ ५४ ॥
ऐन्द्रियकत्वाद् रूपादीनामप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥
केश-नखादि में चेतना क्यों नहीं उपलब्ध होती ?
शरीर के त्वक्पर्यन्त माना जाने से केश-नखादि में चेतना नहीं बनती ॥ ५२ ॥
शरीर इन्द्रियाधिष्ठान है। यह शरीर जीव, मन, सुख-दुःख संवित्ति का अधिष्ठान-
भूत है, उक्त संवित्ति त्वक्पर्यन्त होती हैं, अतः उतने को ही शरीर माना जाता है, केश
नखादि को नहीं । शरीरसंयुक्त होने से केशादि को शरीर कह देते हैं, वस्तुतः वे शरीरा-
वयव नहीं हैं ॥ ५२ ॥
३. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि
( चेतना ) शरीरगुणों से विलक्षण है ॥ ५३ ॥
शरीरगुण दो प्रकार के हैं—कोई अप्रत्यक्ष अनुमेय हैं, जैसे—गुरुत्वादि; कोई
प्रत्यक्ष इन्द्रियग्राह्य हैं, जैसे—रूपादि। चेतना इन दोनों ही प्रकारों से विलक्षण है। वह
संवेद्य होने से भी अप्रत्यक्ष नहीं होती, और मनोविषय होने से इन्द्रियग्राह्य नहीं है। अतः
चेतना शरीरगुण नहीं, अपितु किसी अन्य द्रव्य का गुण है ॥ ५३ ॥
शरीरगुणों से वैलक्षण्यमात्र चेतना का
शरीरावृत्तित्व सिद्ध नहीं करता; क्योंकि रूपादि गुण भी इतरेतरविलक्षण हैं ? ।।५४।।
जैसे एक दूसरे से विलक्षण रूप-स्पर्शादि शरीरगुणत्व से च्युत नहीं होते, उसी तरह
रूपादि से विलक्षण होने के कारण ही चेतना शरीर-गुणत्व को कैसे छोड़ेगी ? ।। ५४ ।।
रूपादिक के ऐन्द्रियक होने से उनमें शरीराश्रयत्व है ॥ ५५ ॥