न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२३
चोपजनापायावन्तरेण त्रैकाल्यव्यक्तिः, ततश्च त्रैकाल्यव्यक्तेरनित्या बुद्धिरित्ये-
तत्सिद्धम्। प्रमाणसिद्धं चेदं शास्त्रेऽप्युक्तम्-‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नम्’, ‘युगपज्-
ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्’ इत्येवमादि, तस्मात्संशयप्रक्रियानुपपत्तिरिति ?
दृष्टिप्रवादोपालम्भार्थं तु प्रकरणम्।
एवं हि पश्यन्तः प्रवदन्ति सांख्याः-पुरुषस्यान्तःकरणभूता नित्या बुद्धिरिति।
साधनं च प्रचक्षते—
विषयप्रत्यभिज्ञानात् ॥ २ ॥
किं पुनरिदं प्रत्यभिज्ञानम् ? ‘यं पूर्वमज्ञासिषमर्थं तमिमं जानामि’ इति
ज्ञानयोः समानेऽर्थे प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्। एतच्चावस्थिताया बुद्धेरुप-
पन्नम्। नानात्वे तु बुद्धिभेदेषूत्पन्नापवर्गिषु प्रत्यभिज्ञानानुपपत्तिः, नान्यज्ञात-
मन्यः प्रत्यभिजानातीति ॥ २ ॥
साध्यसमत्वादहेतुः ॥ ३ ॥
यथा खलु नित्यत्वं बुद्धेः साध्यम् एवं प्रत्यभिज्ञानमपीति । किं कारणम् ?
चेतनधर्मस्य करणेऽनुपपत्तिः। पुरुषधर्मः खल्वयम्—ज्ञानं दर्शनमुपलब्धिर्बोधः
अनित्यता शास्त्र में पीछे कह आये हैं—‘इन्द्रिय-अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान (बुद्धि’)
( १.१.४ ) तथा ‘युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का हेतु हैं’ ( १.१.१६ ) । इन प्रमाणों से
ज्ञान की अनित्यता स्पष्ट सिद्ध है। अतः संशय नहीं बनेगा ?
समाधान—सांख्यमत के प्रौढिवाद का उपालम्भ ( तिरस्कार ) करने के लिये यह
प्रकरण प्रारम्भ किया गया है। साङ्ख्यमतानुयायी ऐसा मानते हैं—‘पुरुष की मनोरूप
बुद्धि अविनाशिनी हैं’। इसमें कारण बतलाते हैं—
विषय का प्रत्यभिज्ञान होने से ॥ २ ॥
यह प्रत्यभिज्ञान क्या है ? ‘जिस अर्थ को मैं पहले जानता था, उसी अर्थ को अब
जान रहा हूँ’—इस तरह दो ज्ञानों का समान अर्थ में प्रतिसन्धिज्ञान ‘प्रत्यभिज्ञान’
कहलाता है। यह अवस्थित ( नित्य ) बुद्धि में ही उपपन्न हो सकता है। उत्पन्नविनाशी
नाना बुद्धिभेद मानने पर यह प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा; क्योंकि अन्य द्वारा ज्ञात को अन्य
कैसे स्मरण करेगा ! ॥ २ ॥
सांख्यमत-निराकरण—
साध्यसम होने से यह ( प्रत्यभिज्ञान ) हेतु हेत्वाभास है ॥ ३ ॥
जैसे बुद्धि का नित्यत्व साध्य हैं, इसी तरह प्रत्यभिज्ञान भी साध्य है। कारण,
चेतन धर्म का अन्तःकरण में सम्भव नहीं है। यह सब—ज्ञान, दर्शन, उपलब्धि,