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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 410 में से

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पृष्ठ 232

२१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
जातिरिति योनिं प्रचक्षते । पञ्च खल्विन्द्रिययोनयः-पृथिव्यादीनि भूतानि,
तस्मात् प्रकृतिपञ्चत्वादपि पञ्चेन्द्रियाणीति सिद्धम् ॥ ६० ॥
कथं पुनर्ज्ञायते-भूतप्रकृतीनीन्द्रियाणि, नाव्यक्तप्रकृतीनीति ?
भूतगुणविशेषोपलब्धेस्तादात्म्यम् ॥ ६१ ॥
दृष्टो हि वाय्वादीनां भूतानां गुणविशेषाभिव्यक्तिनियमः । वायुः स्पर्श-
व्यञ्जकः, आपो रसव्यञ्जिकाः, तेजो रूपव्यञ्जकम्, पार्थिवं किञ्चिद् द्रव्यं
कस्यचिद् द्रव्यस्य गन्धव्यञ्जकम् । अस्ति चायमिन्द्रियाणां भूतगुणविशेषो-
पलब्धिनियमः, तेन भूतगुणविशेषोपलब्धेर्मन्यामहे-भूतप्रकृतीनीन्द्रियाणि,
नाव्यक्तप्रकृतीनीति ॥ ६१ ॥
अर्थपरीक्षाप्रकरणम् [ ६२-७४ ]
'गन्धादयः पृथिव्यादिगुणाः' ( १. १. १४ ) इत्युद्दिष्टम्; उद्देशश्च
पृथिव्यादीनामेकगुणत्वे चानेकगुणत्वे समानम्, इत्यत आह-
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दानां स्पर्शपर्यन्ताः पृथिव्याः ॥ ६२ ॥
अप्तेजोवायूनां पूर्वं पूर्वमपोह्याकाशस्योत्तरः ॥ ६३ ॥
: स्पर्शपर्यन्तानामिति विभक्तिविपरिणामः । आकाशस्योत्तरः शब्दः स्पर्श-
जाति कहते हैं योनि (प्रकृति, कारणविशेष) को । पृथ्वी आदि पाँच भूत पाँचों इन्द्रियों
की योनि हैं। अतः पृथक् पृथक् पाँच प्रकृति होने से भी ये इन्द्रियाँ पाँच हैं ॥ ६० ॥
यह कैसे ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भूतप्रकृतिक हैं, अव्यक्तप्रकृतिक नहीं ?
प्रत्येक भूत की गुणविशेषोपलब्धि से उनके साथ तादात्म्य ज्ञात होता है ॥ ६१ ॥
वायु आदि भूतों का गुणविशेषाभिव्यक्तिनियम लोक में देखा गया है। वायु स्पर्श-
व्यञ्जक है, जल रसव्यञ्जक है, तेज रूपव्यञ्जक है, कोई पार्थिवद्रव्य उसी द्रव्य की
गन्ध का व्यञ्जक है । यह इन्द्रियों का भूतगुणविशेषोपलब्धिनियम है, इस भूतगुणविशेषो-
पलब्धि से हम मान लेते हैं कि इन्द्रियां भूतप्रकृतिक हैं, अव्यक्तप्रकृतिक नहीं ॥ ६१ ॥
पीछे हम नामसंकीर्तनरूप से कह आये हैं कि 'पृथिव्यादि भूतों के गन्धादि विषय
हैं' (१. १. १४), यह नामसंकीर्तन पृथ्व्यादि के एक गुण या अनेक गुण होने पर भी
समान ही है—ऐसा संशय होने पर, कहते हैं—
गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दों में स्पर्शपर्यन्त पृथ्वी के विषय हैं ॥ ६२ ॥
इन में से पूर्व का एक एक छोड़ कर जल, तेज, वायु के विषय हैं, आकाश का
केवल अन्तिम ( शब्द ) विषय है ॥ ६३ ॥
'स्पर्शपर्यन्त' शब्द में विभक्तिविपरिणाम करके 'स्पर्शपर्यन्त गुणों से उत्तर'—ऐसा