न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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र्भवन्ती सङ्कल्पादन्यस्मिन् रागकारणे सति वाच्या, कार्यद्रव्यगुणवत् । न
चात्मोत्पादः सिद्धः, नापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमस्ति । तस्मादयुक्तम्-‘सगुण-
द्रव्योत्पत्तिवत् तस्योत्पत्तिः’ इति ।
अथापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणं धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपादीयते, तथापि
पूर्वशरीरयोगोऽप्रत्याख्येयः । तत्र हि तस्य निर्वृत्तिः, नास्मिन् जन्मनि, तन्मय-
त्वाद्राग इति । विषयाभ्यासः खल्वयं भावनाहेतुः तन्मयत्वमुच्यते इति ।
जातिविशेषाच्च रागविशेष इति । कर्म खल्विदं जातिविशेषनिर्वर्तकं तादात्म्या-
त्ताच्र्छब्द्यं विज्ञायते । तस्मादनुपपन्नं सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमिति ॥ २६ ॥
शरीरपरीक्षाप्रकरणम् [ २७-३१ ]
अनादिश्चेतनस्य शरीरयोग इत्युक्तम् । स्वकृतकर्मनिमित्तं चास्य शरीरं
सुखदुःखाधिष्ठानम्, तत् परीक्ष्यते-किं घ्राणादिवदेकप्रकृतिकम् ? उत नानाप्रकृ-
तीति ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः संशयः । पृथिव्यादीनि भूतानि सङ्ख्या-
विकल्पेन शरीरप्रकृतिरिति प्रतिजानत इति ।
किं तत्र तत्त्वम् ?
सिद्ध नहीं होती, न सङ्कल्प से अन्य रागकारण ही सिद्ध हैं । इसलिए यह कहना कि
'सगुण द्रव्य की तरह आत्मा के राग की उत्पत्ति होती हैं'—अयुक्त ही है ।
यदि उक्त सङ्कल्प से अन्य रागकारण अदृष्ट धर्माधर्म मानें तो भी शरीर से
शरीरान्तर के सम्बन्ध का प्रत्याख्यान नहीं होगा । इस पक्ष में, उस जन्म में उसकी
निर्वृत्ति बन सकती है, इस जन्म में नहीं; क्योंकि विषयाभ्यासमूलक राग तन्मय होता है ।
यह भावनाहेतुक विषयाभ्यास ही 'तन्मय' कहलाता है । करभादि-जन्मविशेष से कण्टक-
भक्षणादि रागविशेष की उपपत्ति बनती है । कर्म ही उस-उस जातिविशेष का निर्वर्तक
है । आत्मा में उस शरीर का तादात्म्य होने से उपचारात् उन-उन शरीरवाचक पदों
का उस (आत्मा) में व्यवहार होता है । कर्म जातिविशेष का निर्वर्तक माना जाता है ।
अतः यह कहना भी अयुक्तियुक्त ही है कि 'सङ्कल्प से अतिरिक्त कोई अन्य राग का
कारण बन सकता है' ॥ २६ ॥
चेतन तथा शरीर का सम्बन्ध अनादि है—यह हम अभी पीछे कह आये हैं ! इस
चेतन का यह शरीर स्वकर्मनिमित्तक तथा इसके सुख दुःख का अधिष्ठान ( = अवच्छेदक,
भोगाश्रय ) है ! उसके विषय में अब विचार करना है कि वह घ्राणादि की तरह एक-
भूतसमवायिकारणक है, या नानाभूतों से बना है ? यह संशय क्यों हुआ ? विप्रतिपत्ति
के कारण । ये विप्रतिपन्न वादी पृथिव्यादि पञ्चभूतों को सङ्ख्याविकल्प से शरीर का
समवायिकारण स्थापित करते हैं ।
इन विभिन्न वादियों के मतों में कौन सा मत समीचीन है ?