न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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नियतमुपसर्पणं क्रियोपलभ्यते । न च स्तन्याभिलाषलिङ्गमन्यदाहाराभ्यासकृतात्
स्मरणानुबन्धात् । निमित्तं दृष्टान्तेनोपपाद्यते, न चासति निमित्ते कस्यचिदु-
त्पत्तिः । न च दृष्टान्ते दृष्टमभिलाषहेतुं बाधते । तस्मादयसोऽयस्कान्ताभिगम-
नमदृष्टान्त इति ।
अयसः खल्वपि नान्यत्र प्रवृत्तिर्भवति, न जात्वयो लोष्टमुपसर्पति, किंकृतोऽ-
स्य नियम इति ? यदि कारणनियमात् ? स च क्रियानियमलिङ्गः । एवं बाल-
स्यापि नियतविषयोऽभिलाषः कारणनियमाद्भवितुमर्हति । तच्च कारणमभ्यस्त-
स्मरणम्, अन्यद्वेति दृष्टेन विशिष्यते । दृष्टो हि शरीरिणामभ्यस्तस्मरणादाहारा-
भिलाष इति ॥ २३ ॥
५. इतश्च नित्य आत्मा । कस्मात् ?
वीतरागजन्मादर्शनात् ॥ २४ ॥
'सरागो जायते' इत्यर्थादापद्यते । अयं जायमानो रागानुबद्धो जायते, रागस्य
पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनं योनिः । पूर्वानुभवश्च विषयाणामन्यस्मिन् जन्मनि
शरीरमन्तरेण नोपपद्यते । सोऽयमात्मा पूर्वशरीरानुभूतान् विषयान् अनुस्मरन्
उपसर्पणक्रिया उपलब्ध होती है, स्तन्याभिलाषहेतुकनिमित्त दूसरे आहार से जन्म
अभ्यास के स्मरणानुबन्ध के विना नहीं हो सकता ।
निमित्त दृष्टान्त से उपपन्न होता है, निमित्त के बिना किसी की उपपत्ति नहीं
होती । दृष्टान्त में दृष्ट तत्त्व अभिलाषनिमित्त का बाध नहीं करता, इसलिये लोह का
अयस्कान्त मणि के पास जानेवाला दृष्टान्त युक्त नहीं ।
लोह की भी अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती, लोह कभी पत्थर की तरफ नहीं सरकता—
यह नियम किस हेतु से बना ? यदि कारणनियम से मानोगे तो वह क्रियानियमलिङ्ग बन
गया । इसी तरह शिशु का भी नियतविषयक अभिलाष कारणनियम से बन सकता है ।
वह कारण अभ्यस्त स्मरण है, या कोई अन्य—यह निर्णय अस्मदादि दृष्ट से किया जा
सकता है । प्राणियों का अभ्यस्त स्मरण से आहाराभिलाष हम लोग देखते ही हैं । अतः
उक्त नियम में कोई बाधा नहीं है ॥ २३ ॥
५. इस कारण भी आत्मा नित्य है; क्योंकि
वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ॥ २४ ॥
इससे 'सराग प्राणी उत्पन्न होता है'—यह अर्थात् आपन्न हुआ । यह प्राणी उत्पन्न
होता हुआ रागानुबद्ध होता है । राग का कारण है पूर्वानुभूत विषयों का पुनः पुनः
चिन्तन । विषयों का पूर्वानुभव अन्य जन्म में शरीर धारण किये बिना नहीं बन सकता ।
यह आत्मा पूर्व शरीर में अनुभूत विषयों का अनुस्मरण करता हुआ उन उन विषयों में