न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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विकारानुपपत्तिः । नित्यत्वेऽविनाशित्वात् कः कस्य विकार इति ! अथानित्या
वर्णा इति पक्षः ? एवमप्यनवस्थानं वर्णानाम् । किमिदमनवस्थानं वर्णानाम् ?
उत्पद्य निरोधः । उत्पद्य निरुद्धे इकारे यकार उत्पद्यते, यकारे चोत्पद्य निरुद्धे
इकार उत्पद्यत इति कः कस्य विकारः ! तदेतदवगृह्य सन्धाने सन्धाय चावग्रहे
वेदितव्यमिति ॥ ५२ ॥
नित्यपक्षे तु तावत् समाधिः—
नित्यानामतीन्द्रियत्वात्तद्धर्मविकल्पाच्च वर्णविकाराणामप्रतिषेधः ? ॥ ५३ ॥
नित्या वर्णा न विक्रियन्त इति विप्रतिषेधः । यथा नित्यत्वे सति किञ्चि-
दतीन्द्रियम्, किञ्चिदिन्द्रियग्राह्यम्, इन्द्रियग्राह्याश्च वर्णाः; एवं नित्यत्वे सति
किञ्चिन्न विक्रियते, वर्णास्तु विक्रियन्त इति ?
विरोधाद्धेतुस्तद्धर्मविकल्पः; नित्यं नोपजायते नापैति । अनुपजनापायधर्मकं
नित्यम् । अनित्यं पुनरुपजनापाययुक्तम्, न चान्तरेणोपजनापायौ विकारः
सम्भवतीति । तद्यदि वर्णा विक्रियन्ते ? नित्यत्वमेषां निवर्त्तते । अथ नित्याः ?
विकारधर्मत्वमेषां निवर्त्तते । सोऽयं विरुद्धो हेत्वाभासो धर्मविकल्प इति ॥ ५३ ॥
विकार नहीं बनेगा; क्योंकि नित्य मानने पर उनके अविनाशी होने से कौन किसका
विकार होगा ! यदि 'वर्ण अनित्य हैं' यह पक्ष मानते हो तो भी वर्णों का अनवस्थान ही
रहेगा । 'अनवस्थान' से तात्पर्य है 'उत्पन्न होकर उनकां निरोध' । इकार के उत्पन्न
होकर निरुद्ध होनेपर यकार उत्पन्न होता है, और यकार के उत्पन्न होकर निरुद्ध होने
पर इकार उत्पन्न होता है, तब बताइये—इनमें कौन किसका विकार बन सकता है !
यह 'उत्पन्न होकर निरोध' अवग्रह ( असंहिता ) करके सन्धि के विषय में या सन्धि
करके अवग्रह के विषय में समझना चाहिये ॥ ५२ ॥
शंका—नित्यपक्ष में तो समाधान हो सकता है—
नित्य वर्णों के अतीन्द्रिय होने से तथा तद्धर्मविकल्प से वर्णविकार का प्रतिषेध नहीं
बन सकता ? ॥ ५३ ॥
'वर्ण नित्य हैं' यह मानने पर उनमें विकार नहीं होगा—यह आप नहीं कह सकते;
क्योंकि नित्य होने पर कुछ पदार्थ अतीन्द्रिय तथा कुछ इन्द्रियग्राह्य होते हैं; वर्ण
इन्द्रियग्राह्य हैं । इस प्रकार, नित्य होने पर कोई पदार्थ विकृत नहीं होता, वर्ण विकृत
हो जाते हैं ?
उत्तर—यह 'तद्धर्मविकल्प' विरुद्ध होने से यहाँ हेतु नहीं बन सकता । नित्य न
उत्पन्न होता है, न विनष्ट । नित्य अनुत्पादाविनाशधर्मक होता है, और अनित्य उत्पाद-
विनाशधर्मक । उत्पत्ति, विनाश के विना विकार बनता नहीं । इस नय से, वर्ण यदि
विकृत होते हैं तो उनमें नित्यत्व कहाँ रहा ! यदि नित्य हैं तो इनमें विकारधर्म कैसे
रहेगा ! अतः आपका यह 'धर्मविकल्प' हेतु हेत्वाभास है ॥ ५३ ॥