न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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सति द्रव्यभावे विकारवैषम्ये नाऽनडुहोऽश्वो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेः; एव-
मिवर्णस्य न यकारो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेरिति !॥ ४६ ॥
३. इतश्च न सन्ति वर्णविकाराः—
विकारप्राप्तानामपुनरापत्तेः ॥ ४७ ॥
अनुपपन्ना पुनरापत्तिः । कथम् ? पुनरापत्तेरननुमानादिति । इकारो यकार-
त्वमापन्नः पुनरिकारो भवति, न पुनरिकारस्य स्थाने यकारस्य प्रयोगोऽप्रयोग-
श्चेत्यत्रानुमानं नास्ति ॥ ४७ ॥
सुवर्णादीनां पुनरापत्तेरहेतुः ? ॥ ४८ ॥
अननुमानादिति न । इदं ह्यनुमानम्—
सुवर्णं कुण्डलत्वं हित्वा रुचकत्वमापद्यते, रुचकत्वं हित्वा पुनः कुण्डलत्व-
मापद्यते, एवमिकारोऽपि यकारत्वमापन्नः पुनरिकारो भवतीति ? ॥ ४८ ॥
व्यभिचारादननुमानम्, यथा—पयो दधिभावमापन्नं न पुनः पयो भवति,
किमेवं वर्णानां न पुनरापत्तिः ? अथ सुवर्णवत् पुनरापत्तिरिति ?
सुवर्णोदाहरणोपपत्तिश्च—
न; तद्विकाराणां सुवर्णभावाव्यतिरेकात् ॥ ४९ ॥
क्योंकि वहां विकारधर्म की उत्पत्ति नहीं है; इसी तरह इवर्ण भी यकार का विकार नहीं
है, क्योंकि यहाँ विकारधर्म की उपपत्ति नहीं है ॥ ४६ ॥
३. इसलिये भी वर्ण विकार नहीं हैं, क्योंकि—
विकारापन्नों की पुनरापत्ति नहीं हुआ करती ॥ ४७ ॥
यहाँ पुनःप्राप्ति अनुपपन्न है; कैसे ? पुनरापत्ति से विकार का अनुमान नहीं होता ।
यहाँ तो इकार यकार बनकर फिर इकार बन जाता है । यकार के स्थान में इकार का
प्रयोग है, या अप्रयोग, अतः इस विषय में विकार का अनुमान नहीं होता ॥ ४७ ॥
सुवर्णादिकों के पुनरापादन से उक्त हेतु नहीं बनता ? ॥ ४८ ॥
अनुमान नहीं होता—यह आपका कथन उचित नहीं; क्योंकि यह अनुमान है—
‘सुवर्ण कुण्डलत्व को छोड़कर रुचकत्व-आकृति प्राप्त कर लेता है, रुचकत्व को छोड़कर
पुनः कुण्डलत्वाकृति धारण कर लेता है । इसी तरह इकार भी यकार बन कर पुनः
इकार बन जाता है’ ? ॥ ४८ ॥
हेतु के व्यभिचरित होने से अनुमान नहीं है; जैसे दूध के दही बन जाने पर पुनः
वह दूध नहीं बन सकता । क्या इस दूध की तरह वर्णों का पुनरापादन नहीं होता,
या सुवर्ण की तरह पुनरापादन हो जाता है ? सुवर्ण की तरह आपादन तो—
नहीं होता; क्योंकि उस सुवर्ण के विकार उससे अतिरिक्त नहीं हैं ॥ ४९ ॥