न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
धर्मतया भिन्नाः श्रूयन्ते-तदुभयं नोपपद्यते, नानाभूतानामुत्पद्यमानानामयं धर्मः,
नैकस्य व्यज्यमानस्येति । अस्ति चायं विभागो विभागान्तरं च, तेन विभागोप-
पत्तेर्मन्यामहे-न प्रतिद्रव्यं रूपादिभिः सह शब्दः संन्निविष्टो व्यज्यत इति ॥३९॥
शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् [ ४०-५६ ]
द्विविधश्चायं शब्दः-वर्णात्मकः, ध्वनिमात्रश्च । तत्र वर्णात्मनि तावत्-
विकारादेशोपदेशात् संशयः ॥ ४० ॥
दध्यत्रेति केचिद् इकार इत्वं हित्वा यत्वमापद्यत इति विकारं मन्यन्ते ।
केचिदिकारस्य प्रयोगे विषयकृते यदिकारः स्थानं जहाति तत्र यकारस्य प्रयोगं
ब्रुवते । संहितायां विषये इकारो न प्रयुज्यते तस्य स्थाने यकारः प्रयुज्यते स
आदेश इति, उभयमिदमुपदिश्यते । तत्र न ज्ञायते-किं तत्त्वमिति ?
आदेशोपदेशस्तत्त्वम्-
विकारोपदेशे ह्यन्वयस्याग्रहणाद्विकारानुमानम् । सत्यन्वये किञ्चिन्निवर्तते
किञ्चिदुपजायत इति शक्यते विकारोऽनुमातुम् । न चान्वयो गृह्यते, तस्माद्
विकारो नास्तीति ।
सधर्मी शब्द तीव्र, मन्द भेद से भिन्न होते हुए सुने जाते हैं'-ये दोनों विभाग नहीं
बनेंगे; क्योंकि ये अनेक धर्म नाना प्रकार के उत्पद्यमान शब्दों में सम्भावित हैं, न कि
एक व्यज्यमान में अथवा अन्य विभाग भी क्लृप्त ही धर्म हैं। इस विभागोपपादन से
हम मानते हैं कि शब्द प्रत्येक शब्द में रूपादिकों के साथ सन्निविष्ट होता हुआ व्यक्त
नहीं होता ॥ ३९ ॥
यह शब्द दो -प्रकार का होता है-१. वर्णात्मक, तथा २. ध्वनिमात्र । वहाँ
वर्णात्मक में-
विकारात्मक आदेश कहने से संशय होता है ॥ ४० ॥
जैसे 'दध्यत्र' यहाँ कुछ विद्वान् ( कालापमतानुसारी वैयाकरण ) इकार में इत्व को
हटाकर यत्व होता है, इसे विकार मानते हैं। कुछ ( सारस्वतव्याकरणवाले ) विद्वान्
इकार के कार्यत्वेन दृष्ट प्रयोग में जो इकार स्थान छोड़ता है वहाँ यकार का प्रयोग कहते
हैं । संहिताविषय ( सन्धि ) में इकार नहीं बोला जाता, वहाँ इकार के स्थान में यकार
का प्रयोग होता है, यह प्रयोग 'आदेश' कहलाता है। यहाँ इकार, यकार-दोनों का
उपदेश किया गया है। इस प्रसंग में, सचाई ( तत्त्व ) क्या है, पता नहीं लगता ?
वैयाकरणमूर्धन्य पाणिनि के मत से आदेशोपदेश ही वहाँ सचाई है। विकारोपदेश मानने
पर, अन्वयज्ञान न होने से विकार का अनुमान नहीं बनेगा। अन्वय होने पर, सुवर्ण में कुछ
'पिण्डाद्याकार' वहाँ निवृत्त होता है, कुछ 'कुण्डलाद्याकार' पैदा होता है, अतः अनुमान
बन सकता है। चूँकि यहाँ कुण्डल, रुचकादि की सुवर्णविषयानुवृत्ति की तरह अन्वय नहीं
हो पाता, अतः विकार नहीं है।