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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

५. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३९
'असति कारणे कार्यं नोत्पद्यते' इति वाक्यात्प्रत्यनीकभूतोऽर्थः सति कारणे
कार्यमुत्पद्यते इत्यर्थादापद्यते । अभावस्य हि भावः प्रत्यनीक इति । सोऽयं
कार्योत्पादतः सति कारणेऽर्थादापद्यमानो न कारणस्य सत्तां व्यभिचरति, न
खल्वसति कारणे कार्यमुत्पद्यते, तस्मान्नानेकान्तिकी ।
यत्तु सति कारणे निमित्तप्रतिबन्धात् कार्यं नोत्पद्यत इति ? कारणधर्मोऽसौ,
न त्वर्थापत्तेः प्रमेयम् । किं तर्ह्यस्याः प्रमेयम् ? सति कारणे कार्यमुत्पद्यते इति
योऽसौ कार्योत्पादः कारणस्य सत्तां न व्यभिचरति तदस्याः प्रमेयम् । एवं तु
सत्यनर्थापत्तावर्थापत्त्यभिमानं कृत्वा प्रतिषेध उच्यते इति । दृष्टश्च कारणधर्मो
न शक्यः प्रत्याख्यातुमिति ॥ ४ ॥
प्रतिषेधाप्रामाण्यं चानेकान्तिकत्वात् ॥ ५ ॥
अर्थापत्तिर्न प्रमाणमनेकान्तिकत्वादिति वाक्यं प्रतिषेधः । तेनानेनार्थापत्तेः
प्रमाणत्वं प्रतिषिध्यते, न सद्भावः-एवमनेकान्तिको भवति । अनेकान्तिकत्वाद-
प्रमाणेनानेन न कश्चिदर्थः प्रतिषिध्यते इति ॥ ५ ॥
'कारण न होने पर कार्य नहीं होता' इस सिद्धान्त से 'कारण होने पर कार्य होता
हैं'—यह विरोधी अर्थ अनुमान से ज्ञात हो जाता है । अभाव का भाव-विरोधी अर्थ है ।
यह कार्योत्पत्ति अनुमान से मालूम होती हुई कारण की सत्ता को व्यभिचरित नहीं करती ।
यह तो नहीं होता कि कारण न होने पर भी कार्य होता है । अतः अर्थापत्ति में अनै-
कान्तिकत्व दोष कैसे दिया जा सकता है !
यह भी होता है कि 'कारण होने पर भी निमित्तप्रतिवन्ध से कार्य उत्पन्न नहीं
होता' ? यह प्रतिबन्धक कारण-धर्म है । ऐसा उदाहरण अर्थापत्ति का प्रमेय नहीं बन
सकता । तो इसका प्रमेय क्या है ? 'कारण होने पर कार्य होता हैं' इस व्याप्ति से जो
कार्योत्पत्ति होती है वह कारण की सत्ता को व्यभिचरित न करे तो वैसा स्थल अर्थापत्ति
का प्रमेय बन सकता है । पूर्वपक्षी का उदाहरण अर्थापत्ति का नहीं था, परन्तु उसने
उसे उदाहरण मानकर प्रामाण्य-प्रतिषेध में उपस्थित कर दिया । यदि एक बार कहीं
प्रतिबन्धक कारणधर्म प्रत्यक्ष कर लिया गया हो तो उसका खण्डन नहीं किया जा
सकता है ॥ ४ ॥
व्यभिचारदोष होने से प्रतिषेध में प्रामाण्य भी नहीं बनता ॥ ५ ॥
'अर्थापत्ति प्रमाण नहीं हैं, हेतु के अनैकान्तिक होने से'—यह पूर्वपक्षी ने कहा था ।
इस तरह वह अर्थापत्ति के प्रामाण्य का खण्डन कर सकता है, परन्तु उसकी सत्ता का
खण्डन नहीं हुआ; ( क्योंकि लोक में ऐसा नहीं देखा जाता कि जो अनैकान्तिक है, वह
सब होता ही नहीं ।) अतः यह प्रतिषेधहेतु स्वयं अनैकान्तिक बन गया । अनैकान्तिक
होने के कारण इस प्रतिषेधहेतु से किसी अर्थ का प्रतिषेध कैसे किया जा सकता है ! ॥५॥