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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

६२ नीतिवाक्यामृतम्
कृत्या--यज्ञ अनुष्ठान आदि के विधिवत् सम्पन्न न होने से उस के द्वारा
उत्पन्न, कर्त्ता के लिये ही घातक व्यक्ति या विनाशकारी वायु-के
समान हैं !
कृत्या को वश में करने का उपाय—
अनुवृत्तिरभयं त्यागः सत्कृतिश्च कृत्यानां वशोपायाः ॥ १६४ ॥
इन उपर्युक्त प्रकार की कृत्याओं को वश में करने के उपाय हैं—उनकी
इच्छानुसार कार्य कर देना, उनको अभय दान देना, अर्थदान देना, पुनः
उनका सत्कार करना अर्थात् नौकरी आदि दे देना ।
राजा की सामान्यनीति—
क्षयलोभविरागकारणानि प्रकृतीनां न कुर्यात् ॥ १६५ ॥
राजा को चाहिए कि वह अपनी प्रकृति मन्त्री सेनापति आदि अथवा
साधारण प्रजा के विनाश, लोभ और वैराग्य का हेतु न बने अर्थात् प्रजा में
इन बातों को न पैदा होने दे ।
प्रजा के असन्तोष की महत्ता—
सर्वकोपेभ्यः प्रकृतिकोपो गरीयान् ॥ १६६ ॥
प्रकृति प्रजा अथवा अमात्यादि का कोप सब कोपों से बढ़कर है ।
दुष्टों के योग्य कार्य—
अचिकित्स्य-दोषदुष्टान् खनिदुर्गसेतुबन्धाकरकर्मान्तेरेषु क्लेश-
येत् ॥ १६७ ॥
जिनके दोष किसी प्रकार दूर ही न किये जा सकते हों ऐसे दुष्टों को खाई,
किला, पुल बाँध आदि के कार्यों में लगाकर पीडित करे ।
गोष्ठी के अयोग्य व्यक्ति—
अपराध्यैरपराधकैश्च सह गोष्ठीं न कुर्यात् ॥ १६८ ॥
अपराधी और अपराध करानेवालों के साथ उठना-बैठना आदि छोड़ दे ।
दृष्टान्त—
ते हि गृहप्रविष्टसर्पवत् सर्वव्यसनानामागमनद्वारम् ॥ १६६ ॥
ऐसे व्यक्ति घर में प्रविष्ट सर्प की भांति समस्त प्रकार के दुःखों के लिये
आगमन-द्वार होते हैं ।
किसके आगे न आवे—
न कस्यापि क्रुद्धस्य पुरतस्तिष्ठेत् ॥ १७० ॥
किसी भी क्रोधी के सामने न आवे ।