नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ नीतिवाक्यामृतम्
जो महामूर्ख होते हैं वे ही बहुत क्लेश साध्य किन्तु स्वल्प फल वाले
कार्य आरम्भ करते हैं ।
कापुरुष का लक्षण—
दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥ १२१ ॥
दोष के भय से कार्य न करना कापुरुष का लक्षण है ।
दृष्टान्त—
मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥ १२२ ॥
अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥ १२३ ॥
मृग हैं इसलिए क्या कोई खेती नहीं करता । और अजीर्ण के भय से
क्या कोई भोजन छोड़ देता है ?
विघ्नों की अनिवार्यता—
स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया
न भवन्ति ॥ १२४ ॥
इस संसार में क्या कोई ऐसा भी है या होगा जिसके कार्य में विघ्न न
होते हों ।
दुष्टात्मा की कार्य पद्धति—
आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥ १२५ ॥
अपने प्राणों को संशय में डालकर कार्य प्रारम्भ करना दुष्टात्माओं का
कार्य है ।
महापुरुष की पहिचान—
दूरभीरुत्वमासन्नशूरत्वं ( रिपुं प्रति ) महापुरुषाणाम् ॥ १२६ ॥
महापुरुष लोग शत्रु जब तक दूर रहता है तब तक तो उससे डरते हैं
किन्तु जब वह आक्रमण कर समीप आ जाता है तब अपनी शूरता का प्रदर्शन
करते हैं ।
मृदुता के गुण—
जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥ १२७ ॥
जिस प्रकार कोमल जल प्रवाह बड़े-बड़े पर्वतों को भी फोड़ कर गिरा
देता है उसी प्रकार मृदुतायुक्त राजा भी बड़े-बड़े राजाओं का विनाश कर
देता है ।
प्रियवादिता के लाभ—
प्रियम्बदः शिखीव सदर्पानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥ १२८ ॥
प्रिय वाणी वाला मयूर जिस प्रकार दर्प युक्त सर्पों को नष्ट कर देता है
उसी प्रकार प्रियवक्ता राजा भी सदर्प शत्रुओं का विनाश कर देता है ।