नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 220 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रिसमुद्देशः ४७
स्वामी के द्वारा सुप्रतिष्ठित भेड़ा भी सिंह के समान बली हो जाता है ।
मन्त्रणा के समय ध्यान देने योग्य बातें—
मन्त्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥ ४९ ॥
मन्त्रणा के समय मन्त्रियों को परस्पर झगड़कर विवाद और मनमानी
बातचीत न करनी चाहिए ।
मन्त्रणा के योग्य व्यक्ति—
अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मन्त्रो, लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धि-
र्मन्त्रफलम् ॥ ५० ॥
जो परस्पर विरोधी और ईर्ष्या-द्वेष वाले न हों तथा बहुत स्वच्छन्द
आचरणवाले न हों उनके साथ परामर्श मन्त्रणा है और लघु साधनों से भी
महान् कार्य सिद्धि मन्त्रणा का फल है ।
न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥ ५१ ॥
पत्थर हाथ से उस प्रकार नहीं उठाया जा सकता जैसा कि लकड़ी के
सहारे से ।
राजा की इच्छा मात्र का अनुसरण करना मन्त्री का दोष है—
स मन्त्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥
वह मन्त्री नहीं शत्रु है जो राजा की इच्छा देखकर अकार्य को भी कार्य
बतलाता है ।
वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥ ५३ ॥
इच्छा के विघात से स्वामी को दुःख होना अच्छा है, किन्तु न करने योग्य
काम का उपदेश देकर उसका विनाश करना उचित नहीं है ।
पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननम् ॥ ५४ ॥
अमृत अथवा अमृत के समान हितकारी औषध आदि को पीना न चाहने
वाले बच्चे को क्या माता गाल में थप्पड़ लगाकर नहीं पिलाती ।
मन्त्री की किसी से घनिष्ठता अनुचित है—
मन्त्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥ ५५ ॥
मन्त्रिगण राजा के दूसरे हृदय-रूप होते हैं अतः उनको किसी के साथ
घनिष्ठ स्नेह आदि नहीं रखना चाहिए ।
राजा और मन्त्री का एकचित्त होना—
राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मन्त्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥ ५६ ॥
राजा की ही अनुकूलता और प्रतिकूलता मन्त्रियों की अनुकूलता प्रतिकू-
लता है अर्थात् राजा जिस पर कृपा करे अथवा जिससे द्वेष करे मन्त्रियों के
लिये भी वे ही ग्राह्य और अग्राह्य होने चाहिएं ।