नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ नीतिवाक्यामृतम्
८. वार्त्तासमुद्देशः
वैश्यों की आजीविका का वर्णन—
कृषिः पशुपालनं वणिज्या च वार्त्ता वैश्यानाम् ॥ १ ॥
खेती, पशुपालन और व्यापार ये वैश्यों की आजीविकायें हैं ।
'वार्त्ता' की समृद्धि से राजा की समृद्धि—
वार्त्तासमृद्धौ सर्वाः समृद्धयो राज्ञः ॥ २ ॥
राज्य में वार्त्ता की समृद्धि से राजा की सब प्रकार की समृद्धि होती है ।
कृषि, पशुपालन और व्यापार का सङ्क्षिप्त नाम 'वार्त्ता' है ।
सांसारिक दृष्टि से कौन सुखी है—
तस्य खलु संसारसुखं यस्य कृषिर्धेनवः शाकवाटः सद्मन्युद-
पानं च ॥ ३ ॥
उसको संसार का समस्त सुख भोग प्राप्त है जिस को खेती हो, गाय-बैल
हों, शाक आदि के लिये बाड़ी या बगीचे हों और घर में ही पेय जल का
प्रबन्ध हो ।
अपव्ययी राजा की हानि का वर्णन --
विसाध्यराज्ञास्तन्त्रपोषणे नियोगिनामुत्सवो महान् कोशक्षयश्च ॥४॥
तंत्र-पोषण में व्यर्थ विशेष व्यय करने वाले राजा के अधिकारियों के
यहाँ तो उत्सव मचता है पर राजा के कोष की महती क्षति होती है ।
नित्यं हिरण्यव्ययेन मेरुरपि क्षीयते ॥ ५ ॥
सदा स्वर्ण-व्यय करने से सुमेरु जैसी विशाल धन-राशि भी विनष्ट हो
जाती है !
तत्र सदैव दुर्भिक्षं यत्र राजा विसाधयति ॥ ६ ॥
जहां राजा फिजूलखर्ची होता है वहां सदा ही दुर्भिक्ष की स्थिति बनी
रहती है ।
समुद्रस्य पिपासायां कुतो जगति जलानि ॥ ७ ॥
समुद्र ही यदि प्यासा हो जाय तो उस अनन्त जल-राशि को पूर्ण करने
के लिये संसार में और कहां जल मिलेगा ।
स्वयं जीवधनमपश्यतो महती हानिर्मनस्तापश्च क्षुत्-पिपासाऽप्रति-
कारात् पापं च ॥ ८ ॥
पशुधन की स्वयं देखभाल न करने से बड़ी हानि होती है मन को संताप
भी होता है तथा मूक पशुओं के भूखे-प्यासे बंधे रहने पर पाप भी होता है ।