नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ नीतिवाक्यामृतम्
राजा समस्त वर्ण और आश्रम वालों द्वारा किये गये धर्मानुष्ठान के छठे अंश
का भागी होता है ।
तपस्वियों द्वारा भी राजा का सम्मान—
उञ्छषड्भागप्रदानेन तपस्विनोऽपि राजानं संभावयन्ति ॥ २४ ॥
कण-कण बटोर कर अन्न इकट्ठा कर जीवन निर्वाह करना उञ्छवृत्ति
है । उञ्छ का छठा हिस्सा देकर तपस्वी भी राजा का समादर करते हैं ।
तस्यैतद् भूयाद् योऽस्मान् रक्षति ॥ २५ ॥
तपस्वी कहते हैं यह षष्ठांश उस राजा को प्राप्त हो जो हमारी रक्षा
करता है ।
मङ्गल और अमङ्गल की मान्यता—
तदमङ्गलमपि नामङ्गलँ यत्रास्यात्मनो भक्तिः ॥ २६ ॥
जिस पर अपनी श्रद्धा-भक्ति हो वह वस्तु या व्यक्ति अमंगलकारक होने
पर भी अमंगलकारक नहीं होता ।
पुरुष के कर्त्तव्य—
संन्यस्ताग्निपरिग्रहानुपासीत ॥ २७ ॥
संन्यासी और याज्ञिकों की उपासना करनी चाहिए ।
स्नान के अनन्तर आवश्यक कर्त्तव्य—
स्नात्वा प्राग्देवोपासनान्न कंचन स्पृशेत् ॥ २८ ॥
स्नान के अनन्तर जब तक देवोपासना न कर ले तब तक किसी का
स्पर्श न करे ।
देवमन्दिर में जाने पर गृहस्थ का कर्त्तव्य—
देवागारे गतः सर्वान् यतीन् आत्मसंबन्धिनीर्जरतीः पश्येत् ॥ २९ ॥
देवालय में पहुँच कर समस्त यतियों और कुलवृद्धाओं से शिष्टाचार करे ।
राजा और साधु का सत्कार आवश्यक है—
देवाकारोपेतः पाषाणोऽपि नावमन्येत तत्किं पुनर्मनुष्यः । राजशास-
नस्य मृत्तिकायामिव लिंगिषु को नाम विचारो यतः स्वयं मलिनो खलः
प्रवर्धयत्येव क्षीरं धेनूनाम् । न खलु परेषामाचारः स्वस्य पुण्यमारभते
किन्तु मनोविशुद्धिः ॥ ३० ॥
देवाकार को प्राप्त पाषाण का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिये मनुष्य
तो दूर रहा । राज्यशासन की मुहर मिट्टी पर भी महत्त्वपूर्ण होती है । रूप
या वेषधारी वस्तु का विचार नहीं किया जाता । क्योंकि स्वयं मलिन भी
खली, गायों का दूध ही बढ़ाती है । दूसरों के आचार से अपना पुण्य नहीं
बढ़ता, वह तो मन की निर्मलता पर निर्भर है ।