नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धसमुद्देशः १८१
समस्य समेन सह विग्रहे निश्चितं मरणं जये च सन्देहः आमं हि
पात्रमामेनाभिहतमुभयतः क्षयं करोति ॥ ६८ ॥
समान बल वालों के परस्पर युद्ध में मरण निश्चित होता है और विजय
में सन्देह रहता है । मिट्टी के कच्चे बरतन को दूसरे कच्चे बरतन से टकराने
पर दोनों का नाश होता है । इस दृष्टान्त का आशय है कि समान बल वाले
के साथ युद्ध न करे किन्तु सन्धि कर ले ।
ज्यायसा सह विग्रहो हस्तिना पदातियुद्धमिव ॥ ६९ ॥
बलवान् के साथ लड़ना पैदल का हाथी से लड़ने के समान विनाश-
कारी है ।
स धर्मविजयोराजा यो विधेयमात्रेणैव सन्तुष्टः प्राणार्थमानेषु न
व्यभिचरति ॥ ७० ॥
जो राजा युद्ध के द्वारा किसी को दासमात्र बनाकर ही सन्तुष्ट हो जाता
है और प्रजा के प्राण, धन और सम्मान का अपहरण नहीं करता वह धर्म-
विजयी है ।
स लोभविजयी राजा यो द्रव्येण कृतप्रीतिः प्राणाभिमानेषु न
व्यभिचरति ॥ ७१ ॥
जो राजा द्रव्य मात्र प्राप्त कर सन्तुष्ट हो जाता है और प्रजा के प्राण
और अभिमान का अपहरण नहीं करता वह लोभविजयी है ।
सोऽसुरविजयी यः प्राणार्थमानोपघातेन महीमभिलषति ॥ ७२ ॥
जो विजित देश की प्रजा के प्राणोंको, सम्पत्तिको और सम्मान को
विनष्ट कर उसकी भूमिका अभिलाष रखता है वह असुरविजयी है ।
असुरविजयिनः संश्रयः सूनागारे मृगप्रवेश इव ॥ ७३ ॥
असुरविजयी राजा के आश्रित होना वधिक के गृह में मृगप्रवेश के
समान है ।
यादृशात्तादृशात् वा यायिनः स्वामी बलवान् यदि साधु चर-
संचारः ॥ ७४ ॥
जिस किसी भी प्रकार के आक्रमणकारी से वह प्रभु बलवान् अर्थात् श्रेष्ठ
है जिसका गुप्तचर विभाग ठीक है ।
रणेषु भीतमशस्त्रं च हिंसन् ब्रह्महा भवति ॥ ७५ ॥
संग्राम में, भयभीत और शस्त्रहीन की हिंसा करनेवाला राजा ब्रह्महत्या
का भागी होता है ।
संग्रामधृतेषु यायिषु सत्कृत्य विसर्गः ॥ ७६ ॥