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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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१७६ नीतिवाक्यामृतम्
नदी में बहे जाते हुए मनुष्य के लिये तट पर पुरुष का दिखलाई पड़ना
भी उसके जीवन का कारण होता है।
निरन्नमपि सप्राणमेव बलं यदि जलं लभेत ॥ २३ ॥
यदि जल मिलता रहें तो अन्नहीन भी सेना जीवित रह सकती हैं।
आत्मशक्तिमविज्ञायोत्साहः शिरसा पर्वतभेदनमिव ॥ २४ ॥
अपनी शक्ति का अनुमान किये बिना सबल शत्रु से युद्ध के लिये उत्सा-
हित होना पवंत से टक्कर लेकर शिर फोड़ने के तुल्य हैं।
सामसाध्यं युद्धसाध्यं न कुर्यात् ॥ २५ ॥
शान्तिमय उपायों से सिद्ध हो सकने वाले कार्यों को युद्धसाध्य नहीं
करना चाहिए।
गुडादभिप्रेतसिद्धौ को नाम विषं भुञ्जीत ॥ १६ ॥
जब गुड़ खाने से ही मनोरथ पूर्ण होता हो तो विष कौन खायेगा।
अल्पव्ययभयात् सर्वनाशं करोति मूर्खः ॥ २७ ॥
मूर्ख व्यक्ति थोड़े से व्यय के भय से अपना सर्वनाश कर बैठता है। अर्थात्
वह राजा मूर्ख है जो किसी बली शत्रु राजा द्वारा कोई क्षुद्र वस्तु या प्रदेश
मांगने पर उसे नहीं देता ओर परिणाम स्वरूप उस बलवान् व्यक्ति के क्रुद्ध
होने पर अपना सब कुछ खो देता है।
कोनाम कृतधीः शुल्क-भयाद् भाण्डं परित्यजति ॥ २८ ॥
कौन बुद्धिमान् शुल्क ( चुङ्गी ) देने के डर से अपने व्यापारी माल की
गाँठ त्याग देता है ?
स किं व्ययो यो महान्तम् अर्थ रक्षति ॥ २६ ॥
वह व्यय क्या व्यय कहा जायगा जिससे महान् अर्थराशि नष्ट होने से
बचाई जा सके। प्रसंग के अनुकूल इसका अभिप्राय यह है कि यदि किसी
अत्यन्त बलशाली देश से अपने राज्य की रक्षा के निमित्त शत्रु राजा के
आगत-स्वागत में कुछ खर्च करने से जिससे कि वह प्रसन्न होकर आक्रमण
आदि न करे तो वैसा आगत-स्वागत सम्बन्धी व्यय व्यर्थ व्यय नहीं हैं।
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