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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

षाड्गुण्यसमुद्देशः १६३
उदासीन-मध्यम-विजिगीषु-अरि-मित्र-पार्ष्णिग्राह-आक्रन्द-आसार
अन्तर्धयो यथासंभवगुणविभवतारतम्यान्मण्डलानामधिष्ठातारः ॥२०॥
उदासीन, मध्यम, विजिगीषु, अरि, मित्र, पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आसार
और अन्तर्धि ये यथासंभव गुण और ऐश्वर्य के अनुपात से राजमण्डल के अधि-
ष्ठाता होते हैं ।
अग्रतः पृष्ठतः कोणे वा सन्निकृष्टे वा मण्डले स्थितो मध्यमादीनां
विगृहीतानां निग्रहे संहितानामनुग्रहे समर्थोऽपि केनचित् कारणेना-
न्यस्मिन् भूपतौ विजिगीषुमाणे य उदास्ते स उदासीनः ॥ २१ ॥
राजमण्डल में जो प्रधान राजा के आगे पीछे किसी कोने में अथवा
अत्यन्त समीप स्थित होकर 'मध्यम' आदि युद्ध करनेवालों को रोकने में और
युद्ध के लिये सुसंगठितों को युद्ध का आदेश देने में समर्थ होते हुए भी किसी
कारण-वश जो दूसरे जय के इच्छुक राजा के प्रति उपेक्षा करता है उसे 'उदा-
सीन' कहते हैं ।
उदासीनवदनियतमण्डलोऽपरभूपापेक्षया समधिकबलोऽपि कुतश्चित्
कारणादन्यस्मिन् नृपतौ विजिगीषुमाणे यो मध्यस्थभावमवलम्बते स
मध्यस्थः ॥ २२ ॥
उदासीन के समान ही जिसकी आगे पीछे अथवा कोने में स्थिति निश्चित
न हो तथा अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक बलशाली होकर भी जो किसी
कारणवश अन्य विजयाभिलाषी राजा के प्रति मध्यमवृत्ति अर्थात् न शत्रु न
मित्र का व्यवहार करे वह 'मध्यस्थ' है ।
राजात्मदैवद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नोऽनयविक्रमयोरधिष्ठानं विजिगीषुः ॥२३॥
जिसका राज्याभिषेक हो चुका हो, और जिसको प्राक्तन शुभकर्मों का
भोग प्राप्त हो, ऐश्वर्य और अमात्य आदि से जो सम्पन्न हो और जिसमें
नीति तथा पराक्रम का वास हो ऐसा राजा 'विजिगीषु' कहा गया है ।
य एव स्वस्याहितानुष्ठानेन प्रातिकूल्यमियर्त्ति स एवारिः ॥ २४ ॥
जो अपने आत्मीय का अपकार करके प्रतिकूलता को प्राप्त कर ले वह
'अरि' है ।
मित्रलक्षणमुक्तमेव पुरस्तात् ॥ २५ ॥
मित्र समुद्देश्य में मित्र का लक्षण कहा जा चुका है ।
यो विजिगीषौ प्रस्थितेऽपि प्रतिष्ठमाने वा पश्चात् कोपं जनयति स
पार्ष्णिग्राहः ॥ २६ ॥
शत्रु पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से प्रस्थान किये हुए या करते हुए