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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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१५६ नीतिवाक्यामृतम्
विवाद-मुकदमा प्रारम्भ करके जो न्यायालय में उपस्थित न हों, पुकार
होने पर चला जाय, उसका प्रथम वक्तव्य आगे के वक्तव्य से विरुद्ध पड़ता हो,
पूर्वकथित युक्तियुक्त बात का उत्तर देने में असमर्थ हो और युक्तियुक्त को न
माने, अपना दोष न मान कर दूसरे का दोष निकाले यथार्थ न्याय होने
पर भी न्यायालय का अनौचित्य बतलावे यह सब पराजित के लक्षण हैं।
छलेनाप्रतिभासेन ✻ वचनाकौशलेन चार्थहानिः ॥ ८ ॥
विवाद में यदि सभासद छलकपट करें, अथवा अभियोग के विषय में
ठीक परामर्श और अनुसन्धान न करें बोलने में निपुण न हों तो वादी प्रति-
वादी की व्यर्थ हानि होती है ।
भुक्तिः, साक्षी, शासनं प्रमाणम् ॥ ६ ॥
विवाद में तीन चीज प्रमाण मानी जाती है भुक्ति अर्थात् जमीन
जायदाद पर बारह वर्ष तक का कब्जा, गवाह, और न्यायालयीय लेख दस्ता-
वेज आदि ।
भुक्तिः सापवादा, साक्रोशाः साक्षिणः शासनं च कूटलिखितमिति
न विवादं समापयन्ति ॥ १० ॥
अधिकार अथवा कब्जा बलात् किया गया हो, गवाह सदोष हों, और
(दस्तावेज) अधिकार पत्र साफ लिखा पढ़ा न हो तो विवाद का मुकदमे का
अन्त नहीं हो पाता ।
बलात्कृतमन्यायकृतं राजोपधिकृतं च न प्रमाणम् ॥ ११ ॥
जो बात बलात् कराई गई हो, अन्याय से हुई हो अथवा राज-बल से
हुई हो वह प्रमाणभूत नहीं होती ।
वेश्याकितवयोरुक्तं ग्रहणानुसारितया प्रमाणयितव्यम् ॥ १२ ॥
वेश्या और जुआड़ी का वचन जितना ग्राह्य हो उतना प्रमाणित मानना
चाहिये ।
असत्यंकारे व्यवहारे नास्ति विवादः ॥ १४ ॥
सर्वथा झूठे व्यवहार में विवाद नहीं होता । अर्थात् जब वादीप्रतिवादी
दोनों ही झूठे होंगे तो अभियोग क्या चलेगा ? ।
नीवीविनाशेषु विवादः पुरुषप्रामाण्यात् सत्यापयितव्यो दिव्य-
क्रिया वा ॥ १४ ॥
धरोहर के रूप में रखे गये मूलद्रव्य (पूंजी) के विवाद में जिसके
यहां वह वस्तु रखी गई अथवा जिसने रखी उस पुरुष की विख्यात प्रामा-
✻ प्रतिभास के अनुसन्धान और परामर्श अर्थ के लिये देखिए काव्य
प्रकाश दशम उल्लास प्रारम्भ—वाच्यवैचित्र्यप्रतिभासादेव पर वामन टीका ॥