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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

१३८ नीतिवाक्यामृतम्
नाप्ताशोधितं परस्थानमुपेयात् ॥ ८१ ॥
अपने प्रामाणिक व्यक्तियों के द्वारा परीक्षण कराये बिना शत्रु के स्थान
पर न जाय ।
नाप्तजनैरनारूढं वाहनमध्यासीत ॥ ८२ ॥
प्रामाणिक व्यक्ति जिन पर न बैठ चुके हों ऐसी सवारी पर भी न बैठे।
न स्वैरपरीक्षितं तीर्थं सार्थं तपस्विनं वाभिगच्छेत् ॥ ८३ ॥
अपने आदमियों से परीक्षण कराये विना देवस्थान आदि तीर्थ अथवा
यात्री-दल और तपस्वी के पास न जाय ।
न याष्टिकैरविविक्तं मार्गं भजेत् ॥ ८४ ॥
दण्डधारियों से अपरीक्षित मार्ग पर न जाय ।
न विषापहारौषधिमणीन् क्षणमप्युपासीत् ॥ ८५ ॥
विष दूर करनेवाली ओषधि और मणि का सेवन क्षणभर के लिये भी
न करे ।
मन्त्रिभिषङ्नैमित्तिकरहितः कदाचिदपि न प्रतिष्ठेत् ॥ ८६ ॥
मन्त्री, ज्योतिषी और वैद्य के बिना कभी भी न रहे ।
वह्लावन्यचक्षुषि च भोग्यमुपभोग्यं च परीक्षेत ॥ ८७ ॥
अपने भोग और उपभोग की वस्तुओं का परीक्षण अग्नि के द्वारा अथवा
अन्य व्यक्ति की दृष्टि से कराले ।
अमृते मरुति प्रविशति सर्वदा चेष्टेत ॥ ८८ ॥
अपने सब काम सदा 'अमृतसिद्धि' योग में करे ।
भक्ति-सुरत-समरार्थी दक्षिणे मरुति स्यात् ॥ ८६ ॥
भक्ति कार्य, कामभोग और संग्राम दक्षिण पवन के बहने पर अर्थात्
वसन्तऋतु में करे ।
परमात्मना समीकुर्वन् न कस्यापि भवति द्वेष्यः ॥ ६० ॥
परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेनेवाले से कोई भी द्वेष नहीं
करता ।
मनः-परिजन-शकुन-पवनानुलोम्यं भविष्यतः कार्यस्य सिद्धे-
र्लिङ्गम् ॥ ६१ ॥
मन और नौकर-चाकरों का प्रसन्न होना, अच्छे शकुनों का होना तथा
अनुकूल वायु का चलना भावी कार्यसिद्धि के लक्षण हैं ।
नैको नक्तं दिवं हिण्डेत ॥ ६२ ॥
रात-दिन अकेला ही न भ्रमण करे ।