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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३१
शुक्र·मल·मूत्र·मरुद्वेगसंरोधोऽश्मरीभगन्दरगुल्मार्शसां हेतुः ॥११॥
शुक्र, मल, मूत्र और अपानवायु के वेग को रोकने से पथरी, भगन्दर,
गुल्म और बवासीर रोग होते है ।
गन्धलेपावसानं शौचम् आचरेत् ॥ १२ ॥
शरीर या उसके अङ्ग में लगा हुआ किसी वस्तु का गन्ध और लेप जब
तक छूट न जाय तब तक शुद्धि अर्थात् पानी से धोने आदि की क्रिया करनी
चाहिए ।
बहिरागतो नानाचम्य गृहं प्रविशेत् ॥ १३ ॥
बाहर से घूम-घामकर आने पर बिना कुल्ला किये घर में न प्रविष्ट हो ।
गोसर्गे व्यायामो रसायनमन्यत्र क्षीणाजीर्णवृद्धवातकिरूक्षभोजिभ्यः ॥१४॥
जिनका शरीर रोगादि के कारण क्षीण न हुआ हो, जिनको अजीर्ण का
रोग न हो, जो वृद्ध न हों, जिनको गठिया आदि वायु का रोग न हो और
जिनको रूखा-सूखा भोजन नहीं किन्तु स्निग्ध और पौष्टिक भोजन मिलता हो
उन लोगों के द्वारा प्रातःकाल जब कि गायें जंगल में चरने के लिए खोली
जाती हैं अर्थात् गोधूलि में व्यायाम करना रसायन सेवन के समान महान्
गुणकारी होता है ।
शरीरायासजननी क्रिया व्यायामः ॥ १५ ॥
जिससे शरीर को परिश्रम हो उस क्रिया का नाम व्यायाम है ।
शस्त्रवाहनाभ्यासेन व्यायामं सफलयेत् ॥ १६ ॥
गदा, लाठी तलवार आदि चलाकर तथा घोड़े आदि की सवारी का
अभ्यास कर व्यायाम को सफल बनावे । अर्थात् व्यायाम दण्ड-बैठक आदि के
साथ इनको भी करता रहे ।
आदेहस्वेदं व्यायामकालमुशन्त्याचार्याः ॥ १७ ॥
आचार्यों ने व्यायाम करने की अवधि पसीना निकलने लगने तक
कही है ।
बलातिक्रमेण व्यायामः कां नाम नापदं जनयति ॥ १८ ॥
शक्ति से अधिक व्यायाम करने से कौन सी ऐसी आपत्ति है जो नहीं
उत्पन्न होती अर्थात् शक्ति से अधिक व्यायाम अनेक व्याधियों का घर
होता है ।
अव्यायामशीलेषु कुतोऽग्निदीपनमुत्साहो देहदाढ्यंञ्च ॥ १६ ॥
जिसका व्यायाम करने का स्वभाव नहीं है उसकी जठराग्नि किस प्रकार
दीप्त रह सकती है और उत्साह तथा देह की पुष्टता भी उसे कैसे प्राप्त हो
सकती है ?