सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 220 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

११८ नीतिवाक्यामृतम्
देहिनि गतायुषि सकलाङ्गे किं करोति धन्वन्तरिरपि वैद्यः ॥ ६ ॥
जब प्राणी की आयु ही निःशेष हो गई हो तब समस्त अंगों के होते हुए
भी धन्वन्तरि भी वैद्य के रूप में क्या कर सकते हैं ?
राजा की रक्षा के लिये विचारणीय क्रम—
राज्ञस्तावदासन्नाः स्त्रिय आसन्नतरा दायादा, आसन्नतमाश्च पुत्रा-
स्ततो राज्ञः प्रथमं स्त्रीभ्यो रक्षणं ततो दायादेभ्यस्ततः पुत्रेभ्यः ॥ ७ ॥
राजा की समीपवर्तिनी स्त्रियां होती हैं, उनसे अधिक समीपवर्ती दायाद-
पट्टीदार और उनसे भी निकटतम पुत्र होते हैं । अतः सर्व प्रथम स्त्रियों से
राजा की रक्षा करनी चाहिए उसके अनन्तर पट्टीदारों से और तब पुत्रों से
रक्षा करनी चाहिए ।
आप्लवङ्गादाचक्रवर्त्तिनः सर्वोऽपि स्त्रीसुखाय क्लिश्यति ॥ ८ ॥
वानर से लेकर चक्रवर्ती राजा तक सभी व्यक्ति स्त्री-सुख की प्राप्ति के लिये
ही क्लेश उठाते हैं ।
निवृत्तस्त्रीसङ्गस्य धनपरिग्रहो मृतमण्डनमिव ॥ ६ ॥
वनिताओं के सुख भोग से विरक्त व्यक्ति के लिये धन का संचय मृतक को
वस्त्राभूषण आदि से सुसज्जित करने के समान व्यर्थ है ।
स्त्रियों की प्रकृति का वर्णन—
सर्वाः स्त्रियः क्षीरोदवेला इव विषामृतस्थानम् ॥ १० ॥
सभी स्त्रियां क्षीरसमुद्र के समान विष और अमृत दोनों का स्थान हैं ।
समुद्रमन्थन करने पर उसी से हलाहल विष और अमृत दोनों ही निकले थे
उसी प्रकार स्त्रियां अमृत के समान सुखदायक और विष के समान दुःखदायक
दोनों ही हैं ।
मकरदंष्ट्रा इव स्त्रियः स्वभावादेव वक्रशीलाः ॥ ११ ॥
मगर की दाढ़ के समान स्त्रियां स्वभाव से ही कुटिल स्वभाव वाली
होती हैं ।
स्त्रीणां वशोपायो देवानांमपि दुर्लभः ॥ १२ ॥
स्त्रियों को वश में कर लेने का उपाय देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ।
कलत्रं रूपवत् , सुभगम् , अनवद्याचारम् , अपत्यवदिति महतः
पुण्यस्य फलम् ॥ १३ ॥
स्त्री-सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, अनिन्द्य चरित्रवाली और संतानवाली हो
यह महान् पुण्य से होता है ।
कामदेवोत्सङ्गस्थापि स्त्री पुरुषान्तरम् अभिलषति च ॥ १४ ॥