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सर्वकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

११४ नीतिवाक्यामृतम्
आश्रितभरणे, स्वामिसेवायां, धर्मानुष्ठाने, पुत्रोत्पादने च खलु न
सन्ति प्रतिहस्ताः ॥ २० ॥
अपने सहारे जीने वालों का भरण-पोषण, स्वामी की सेवा, धर्म-कार्यों
का अनुष्ठान और पुत्रोत्पत्ति का कार्य इन चार कार्यों में दूसरे से प्रतिनिधित्व
नहीं कराया जाता।
आश्रितों को दान द्वारा सन्तुष्ट करने की विधि—
तावद् देयं यावदाश्रिताः सम्पूर्णतामाप्नुवन्ति ॥ २१ ॥
अपने आश्रितों को स्वामी को इतना धन देना चाहिए जिससे वह पूर्ण
सन्तुष्ट हो सकें।
सेना का राजा के प्रति कर्तव्य—
न हि स्वं द्रव्यमव्ययमानो राजा दण्डनीयः ॥ २२ ॥
राजा यदि अपना धन (सेवक का, सैन्य का वेतन आदि) न भी दे तब
भी उस पर कुपित अथवा उसे दण्डित न करना चाहिए। अर्थात् सेना को
चाहिए कि वह विद्रोह करके राजासे हठात् वेतन लेने की चेष्टा न करे।
को नाम सचेताः स्वगुडं चौर्यात् खादेत् ॥ २३ ॥
कौन ऐसा समझदार व्यक्ति होगा जो अपना गुड़ चोराकर खायेगा।
किं तेन जलदेन यः काले न वर्षति ॥ २४ ॥
जो समय पर वर्षा न करे उस मेघ से क्या लाभ ?
स किंस्वामी य आश्रितेषु व्यसने न प्रविधत्ते ॥ २५ ॥
वह स्वामी निन्दनीय है जो अपने आश्रितों की आपत्तिकाल में सहायता
नहीं करता।
राजा का सेना के प्रति कर्त्तव्य—
अविशेषज्ञे राज्ञि को नाम तस्यार्थे प्राणव्ययेनोत्सहेत ॥ २६ ॥
जो राजा गुणग्राही और कृतज्ञ नहीं है उसके लिये कौन प्राण देने को
उत्साहित होगा ?
[ इति बलसमुद्देशः ]
२३. मित्रसमुद्देशः
मित्र का लक्षण—
यः सम्पदीव विपद्यपि मेद्यति तन्मित्रम् ॥ १ ॥
जो सुख के दिनों के समान दुःख के दिनों में भी स्नेह करता है वह
'मित्र' है।