नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुर्गसमुद्देशः १०७
२०. दुर्गसमुद्देशः
दुर्ग शब्द का अर्थ—
यस्याभियोगात् परे दुःखं गच्छन्ति दुर्जनोद्योगविषया वा स्वस्यापदो
गमयतीति दुर्गम् ॥ १ ॥
जिसके सम्मुख आ जाने पर शत्रुलोग दुःखी हो जाते हैं और दुष्टों के
उद्योग से अपने ऊपर आने वाली आपत्तियों को जो दूर कर देता है वह
दुर्ग है ।
दुर्ग के दो भेद—
तद् द्विविधं स्वाभाविकम् , आहार्यञ्च ॥ २ ॥
यह दो प्रकार का होता है स्वाभाविक और आहार्य-पर्वत अथवा जल
आदि से स्वभावतः घिरा हुआ स्थान स्वाभाविक दुर्ग है और खाई आदि
से घेर कर पत्थरों आदि से बना हुआ विशाल रक्षा स्थान आहार्य दुर्ग है ।
दुर्ग का स्वरूप—
वैषम्यं, पर्याप्तावकाशो, यवसेन्धनोदकभूयस्त्वं स्वस्य, परेषामभावो,
बहुधान्यरससंग्रहः, प्रवेशापसारौ, वीरपुरुषा इति दुर्गसम्पद्, अन्यद्
बन्दिशालावत् ॥ ३ ॥
भूमि का ऊंचा-नीचा होना, अन्दर बहुत बड़ा स्थान होना, अपने लिये
घास लकड़ी आदि का प्रचुर मात्रा में सुलभ होना किन्तु शत्रु के लिये इनका
अभाव होना। (किले के भीतर गाय बैल घोड़ों का चारा घास आदि और
लकड़ी तथा जल सुलभ हो जो अपने काम आवे और बाहर ये सब कुछ न
मिलें जिससे शत्रु के पशु घास पानी बिना मर जायें और ईंधन तथा जल के
अभाव में शत्रु मर जायं ) प्रचुर अन्न और गोरस घृतादि का संग्रह, प्रवेश-
द्वार और पीछे से निकल भाग सकने का भी द्वार तथा वीर पुरुषों का समूह
इतनी चीजें दुर्ग की महत्ता को बढ़ाने वाली हैं। इनके अभाव में दुर्ग, दुर्ग नहीं
कारागार है ।
दुर्ग का महत्त्व—
अदुर्गोदेशः कस्य नाम न परिभवास्पदम् ॥ ४ ॥
बिना दुर्ग के देश में कौन राजा परास्त नहीं होतो ?
अदुर्गस्य राज्ञः पयोधिमध्ये पोतच्युतपक्षिवदापदि नास्त्याश्रयः ॥५॥
बिना दुर्ग वाले राजा को, समुद्र के मध्य में जहाज से भटके हुए पक्षी के
समान, आपत्तिकाल में कहीं आश्रय नहीं प्राप्त होता ।