निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं०
(१) नराशंस का \ “होता यक्षन्नराशंसं नृशंसं नॄंः
प्रैषमन्त्र { प्रणेतं । गोभिर्वैपावान्त्स्याद्वारैः
{ शक्तीवान्प्रथैः प्रथमयावा हिरण्यै-
{ श्रन्द्री वेत्वाज्यस्य होतर्यज” ।३।
(२) काण्व मेधा- \ “नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञऽ
तिथि उभययाजी { उपह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम्” ।
की नाराशंसी { (अ०१अ०१व२४)
आप्री /
(३) औचथ्य दीर्घ- \ “शुचिः पावकोऽअद्भुतो मध्वायज्ञं
तमा उभययाजी { मिमिक्षति। नराशंस स्त्रिरादिवो
की नाराशंसी { देवो देवेषु यज्ञियः।(अ०२अ०२व१०)
आप्री /
(४) गृत्समद शु- \ नराशंसः प्रतिधा मान्यंजन्र्तिस्रो
नक नराशंस याजी { दिवः प्रतिमन्हा स्वर्त्तिः। घृतप्रुषा
की आप्री { मनसा हव्यमुंदन्मूर्धन्यज्ञस्य
समनक्तु देवान्। (अ०२अ०५व२२)
(५) आत्रेय वसु- \ नराशंसः सुषूदतीमं यज्ञमदाभ्यः
श्रुत नराशंस- { कवि र्हिं मधुहस्त्यः ॥ (अ० ३
याजी की आप्री / अ० ८ व २० )
(६) मैत्रावरुणि \ नराशंसस्य महिमानमेषा मुपस्तो-
वसिष्ठ नराशंस- { षाम यजतस्ययज्ञैः। ये सुक्रतवः
याजी की आप्री { शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवाऽ
/ उभयानिहव्या। (अ०५अ०२व१)