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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 954, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 954

हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ८ अ० ३ पा० ७ क
नपात् आदि नराशंस वर्जित ग्यारह ( ११ ) देवता हैं, पशु-
कर्म में अगस्त्य के गोत्रों का एकादश प्रयाज रूप यह आप्री
सूक्त है ॥
( ४ ) समिद्धोऽग्निः-इत्यादि ( अ० २ अ० ५ व २२ )
सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका गृत्समद ( शौनक ) ऋषि
और त्रिष्टुप् छन्द है । ७वीं ऋक् जगती छन्द है । समिद्ध
अग्नि और तनूनपात्-वर्जित नराशंस आदि ११ देवता हैं ।
पशु कर्म में शुनकों का यह आप्री सूक्त है ॥
( ५ ) समिसमित्-इत्यादि ( अ०२अ०८व२२ ) सूक्त
११ ऋचाओं का है । इसका विश्वामित्र ऋषि और त्रिष्टुप्
छन्द है । इध्म आदि स्वाहाकृतिपर्यन्त नराशंसवर्जित क्रम
से ११ देवता हैं । पशु कर्म में विश्वामित्र गोत्रों का यह
आप्रीसूक्त है । इस सूक्त की 'तनः'-यह ऋचा दर्श पौर्ण-
मास यागों में पत्नीसंयाज होमों में त्वष्टा देवता की याज्या
है । तथा यही ऋचा त्वष्टा देवता के पशु में पुरोडाश की
अनुवाक्या है ॥
( ६ ) सुसमिद्धाय-इत्यादि ( अ०३अ०४व२० ) सूक्त
११ ऋचाओं का है । इसका आत्रेय वसुश्रुत ऋषि और गा-
यत्री छन्द है । इध्म आदि तनूनपात्-वर्जित ११ देवता हैं ।
पशु में अत्रिगोत्रों का यह आप्री सूक्त है ।
(७) जुषस्वनः-इत्यादि ( अ०६अ०७व२४ ) सूक्त ११
ऋचाओं का है । इसका वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है।
समिद्ध आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से प्रत्येक ऋचाओं के
११ देवता हैं । पशु में वसिष्ठ गोत्रों का यह आप्री सूक्त है ।