निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ८ अ० ३ पा० ५ खं०
इस वनस्पति = अग्नि की यह और चौथी ऋचा है-
॥ ४ (१६) ॥
( खं० ५ )
(निघ०) "वनस्पते रशनया नियूय पिष्टतमया
वयुनानि विद्वान् । वहा देवत्रा दिधिषो हवींषि
प्र च दातारममृतेषु वोचः ॥" ( )॥
"वनस्पते रशनया नियूय" सुरूपतमया, "वयु-
नानि विद्वान्" प्रज्ञानानि प्रजानन्, वह देवान्
यज्ञे धातुः हवींषि, प्रब्रूहि च दातारम् 'अमृते-
षु' देवेषु ॥
'स्वाहाकृतयः' 'स्वाहा'-इत्येतत् 'सु' 'आह'-इति
वा । 'स्वा' वाग्- 'आह'- इतिवा । 'स्वंप्राह'-
इति वा । 'स्वाहुतं हविर्जुहोति- इतिवा ।
तासाम् एषा भवति—॥ ५[२०]॥
अर्थः- "वनस्पतेः" यह ऋचा वनस्पति देवता की ही
याज्या है ।
हे 'वनस्पते'! 'पिष्टतमया' (सुरूपतमया) बहुत सुरूप
'रशनया' रस्सी से 'हवींषि' हविओं को 'नियूय' बांधकर
'वयुनानि' (प्रज्ञानानि) अपने अधिकार-युक्त प्रज्ञानों (विद्या-
ओंका 'विद्वान्' (प्रजानन) जानता हुआ 'दिधिषो' (दिधिषोः =
धातुः) देने वाले यजमान के (हविओं को) 'देवत्रा' (देवान्)
देवताओं के प्रति 'वह' लेजा । 'दातारं च' ( यज्ञे ) और