निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ अ० १ पा० ३ ख० ५ ।
( पञ्चम-खण्डः )
त्वत्—समुच्चयार्थे—वेदे—पर्याया इव त्वदाश्विनम् [ऋ०प्रा०१२-१०
[व्याख्या आश्विनञ्च पर्यायाश्च]
ऋत्विगभ्य "इदमन्वब्रूवत इति विज्ञाानकथनम् इतिकर्त्तव्यताकरणञ्च इतीतेषा कर्मणा
विनियोग उक्तः ।
इस ऋचामें होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्यु, चारो ऋत्विजोका कर्म निरूपण किय
है। जैसे होता नाम ऋत्विज् कर्मकालमे ऐसी ऋचाओकों अध्ययन करता है,
जिनमे देवताओके यथार्थ स्वरूप तथा कर्मके मर्मस्थानोकी क्रियाका वर्णन होता है,
एवम् जिनके अध्ययनसे कर्मका पोषण होता है।
उद्गाता ऋत्विज् शक्वरी नामवाली ऋचाओमे गायत्र छन्दका गान करतां है। अर्थात
उद्गाताका सामगानरूप कर्म नियत है।
ब्रह्मनाम एक ऋत्विज् कर्ममे कोई प्रायश्चित्त उपस्थित होनेपर अन्य ऋत्विजोको उसका
विज्ञान कराता है, कि 'यज्ञा यह करो'। क्योकि ब्रह्मा तीनो वेदोका जानर्न
वाला होनेसे सब विद्याओका वक्ता होता है। जो सब ज्ञज्ञ नहीं होता वह ऐसे
अधिकारको नही निभा सकता। और अध्वयु नाम ऋत्विज् यज्ञअकी नानाप्रकारकी
इतिकृत्त ग्यताको करता है।
इसका व्याख्यान १ माध्यार्क ६ठ पाद ४ खण्डमें देखो।
व्याख्यान अ०१ पा०६ ख०३ मे देखी।
“उ॒तत्व॒: पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॒-मु॒तत्व॒: शृ॒ण्वन्नशृ॑णोत्येनाम् ।
उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं १ विस॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑ ॥
[ऋ० स० ८, २, २३, ४]
५ बृहस्पति ऋषि। विद्यामक्त
ऐसे मनुष्य जो सब नेत्रवाले है, इतना ही नहीं, बल्कि—
उनको सभी इन्द्रियां समान हैं, तथा पीठ, पेट, हाथ और पांव
भी समान है, एवम् सभी मनुष्य सखि नाम समान जानकारी-
वाले हैं, अथवा समान शास्त्रोंमें श्रम किये हुये है, अर्थात् वैयाकरण
वैयाकरणोंके ही समानख्यान है, नैरुक्त (निरुक्तके पढ़नेवाले) नैरुक्तोंके
ही समानख्यान (ज्ञान) हैं, तो भी वे मनोगम्य (प्रतिभासे जानने