निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७० ) ८ अ० २ पा० १२ खं०
'स्वयशाः' आत्मयशाः ।
'उपस्थे' उपस्थाने ।
“उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं
प्रति जोषयेते”
द्यावापृथिव्यौ- इति वा । अहोरात्रे इति वा ।
अरणी इति वा । प्रत्यक्ते 'सिंहं' सहनं प्रत्यासेवे-
ते ॥१२(१५) ॥
इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२ ॥
अर्थ:- “आविष्ट्यो०” 'आविष्ट्यः प्रकाश का विस्तार
करने वाला 'चारुः' चलने वाला [ कभी स्थिर नहीं होता ]
'जिह्मानाम्' टेढे काष्ठों या मनुष्योंके लिये भी 'ऊर्ध्वः' सदा
ऊपर की ओर जलने बाला 'उपस्थे' ( उपस्थाने ) उपस्थान
में = स्तुति में 'स्वयशाः' ( आत्मयशाः ) अपने यश को धा-
रण करने वाला किन्तु दूसरे में आश्रित होकर यश वाला
नहीं [ ऐसा त्वष्टा = अग्नि ] 'आसु' [ क्रियासु ] इन क्रिया-
ओं में 'वर्द्धते' बढता है । 'उभे' दोनों ही 'जायमानात्'
( एव ) उत्पन्न होते ही हुए 'त्वष्टुः' त्वष्टा अग्नि देव से
'बिभ्यतुः' डरीं । 'प्रतीची' ( प्रत्यक्ते ) इस के प्रति अभिमुख
गई हुईं 'सिंहं-प्रति' सहन के प्रति (सहने को) 'जोषयेते'
(प्रत्यासेवेते ) सेवा करती हैं ॥
'आविष्ट्यः' क्या ? 'आविः' नाम प्रकाश, क्यों ? आवे-
दन ( ज्ञान देने ) से, और 'त्य' उसका फैलाने वाला [ प्र-
काश का फैलाने वाला ] 'आविष्ट्य' है ।