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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 934, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 934

हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० २ पा० ११ खं०
'अपिंशत्' (अकरोत्) किया था, और 'विश्वा' (सर्वाणि) सब 'भूता-
नि च' भूतों को किया था, हेहोतः (त्वम्) तू 'इषितः' इच्छा-
वान् 'यजीयान्' बड़ा यज्ज करने वाला 'विद्वान्' जानने
वाला 'इह' इस यज्ज कर्म में 'तम्' उस 'त्वष्टार देवम्' त्वष्टा
देवको 'यक्षि' (यज) यजन कर ।
यह त्वष्टा देव मध्यम लोक का है, ऐसा कोई नैरुक्त आ-
चार्य मानते हैं । क्यों कि- मध्यम स्थान में उसका समाम्नान
हुआ है।
यही 'अग्नि' त्वष्टा दैव है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
“तस्य०” उसकी यह और ऋचा है-॥११ (१४)॥
व्याख्या।
“य ईमे०” यह मन्त्र 'त्वष्टा' देवता के लिये निगम दिया है,
किन्तु इसमें अभी यह निर्णय नहीं हुआ कि- यह देवता
कौन से लोक का है ? पृथिवी लोक का है ? या मध्यम लोक
का है ?
सन्देह क्यों हुआ, यह 'त्वष्टा' पद पृथिवी स्थान के
देवताओं के नामों में [निघ० अ० ५ खं० २ प० ११) और
मध्यम स्थान के देवताओं के नामों में [निघ० अ० ५ खं० ४ प० २१]
भी पढ़ा है, इसीसे उक्त सन्देह हुआ ।
कई नैरुक्त आचार्य मानते हैं कि- यह मध्यम लोक का
देवता है और उस में तीन हेतु देते हैं--
१- मध्यम स्थान देवताओं में त्वष्टा नाम का पाठ ।
२- मन्त्र- व्यपदेश या मन्त्र का अर्थ- मनुष्य होता
कहता है कि- 'हे होत,' तू द्यावापृथिवी और भूतों के