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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 896, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 896

हिन्दी निरुक्त ( १२८ ) ८ अ० १ पा० २ खंड
अथापि एतं सोमपानेन स्तौति ॥
अथापि आह- “द्रविणोदाः पिबतु द्रविणोदसः”
[ऋ०सं० २,८,१,४] इति ॥२॥
अर्थ:- “द्रविणोदाः” यह ऋचा मेधातिथि ऋषिकी है।
(क) ‘द्रविणसः’ [द्रविणसानिनः] द्रव्य के लोभ से कर्म
में बैठने वाले अथवा (द्रविणसानिनः) गो आदि रूप धन के
भजने वाले या देवता के हविः के भजने वाले ‘ग्रावहस्तासः’
सोमके कूटने के अर्थ पत्थरों को हाथ में लिए हुए ऋत्विज्
‘अध्वरे’ अग्निष्टोम आदि यज्ञ में ‘यज्ञेषु’ हविः के दानों में
अथवा यज्ञ के स्थानों में [यः] जो ‘द्रविणोदाः’ धन या बल
का देने वाला है, (सम् उस ‘देवम्’ देवको ‘ईळते’ (याचन्ति)
जांचते हैं (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं (वर्द्धयन्ति) बढ़ाते हैं
अथवा (पूजयन्ति) पूजते हैं [वह द्रविणोदस् (धन बल का देने
वाला) देव हमें धन बल देवे, यह हम चाहते हैं।] (ऐसी
आशिषा जोड़ कर मन्त्र का अर्थ पूरा किया जाता है।)॥
(ख) (यं) ‘देवं’ (द्रविणोदसम्) ‘अध्वरे’ ‘यज्ञेषु’ ‘ग्राव-
हस्तासः’ (ऋत्विजः) ‘ईळते’ (सः देवः) ‘द्रविणोदाः’ ‘द्रविणसः’
(अस्मात् सोमात् द्रविणसंभक्तुः आदाय स्वमंशं पिबतु
एतद् आशास्महे)
जिस द्रविणोदस् देवको अध्वर = यज्ञ में यज्ञ के
स्थानों में पत्थरों को हाथ में लिये हुए ऋत्विज् स्तुति करते
हैं; वह द्रविणोदस् = धन और बल का दाता देव ‘द्रविणसः’
इस सोमसे उसके भजने वाले ऋत्विज् से लेकर अपने अंश को
प्राप्त करे। यह हम चाहते हैं।