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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 866, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 866

हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ६पा० ८खं
होते- भग आदिकों का विशेषण “वैश्वानर” शब्द होता-
हे भग!, वैश्वानर ! हे सवितः ! वैश्वानर ! इत्यादि, और आ-
दित्य कर्म से इस ( वैश्वानर ) की स्तुति करते- “उदेषि”
तू उदय होता है, “अस्तमेषि” तू अस्त होता है,
“विपर्य्येषि” तू उलटा फिरता है इत्यादि । [किन्तु ये दोनो
बातें नहीं हैं, क्या कि न उत्तम लोक के देवताओं के सूक्तों में
वैश्वानर के प्रवाद हैं, और न आदित्य कर्म से वैश्वानर की
स्तुति ही है। इससे सूर्य वैश्वानर नहीं है । ]
[ और पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर शब्द का वाच्य है,
इस में यह विशेष हेतु भी है कि-] अग्नि के सूक्तों में ही
वैश्वानर के प्रवाद आते हैं- अग्नि का विशेषण 'वैश्वानर'-
शब्द आता है- [ “वैश्वानर मृत आजातमग्निम्”
[ ऋ० सं० ४, ५, ६, १] इत्यादि ] । और अग्नि के कर्म
से (ऋषि, ) ( वैश्वानर को ) स्तुति करता है- “वहसि”-
हे वैश्वानर! तू हविओं को पहुंचाता है, “पचसि”-पकाने
योग्य द्रव्यों को तू पकाता है, “दहसि”- जलाने योग्य
तृण काष्ठ आदि को तू जलाता है ॥ इससे अग्नि ही वैश्वा-
नर है, यह स्थिर हो गया ॥
[केचित्मतका खण्डन]
“यथो एतद्०” जो कि यह (आक्षेप किया-) क्यों कि
वर्ष कर्म से इसकी स्तुति करता है, (इससे मध्यम है) ।
इस ( पार्थिव अग्नि ) में भी यह उपपन्न होता है-
घंटता है- ॥ ८ ॥