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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 812, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 812

हिन्दी निरुक्त ( ४० ) ७ अ० २ पा० ३ खं०
वानों की स्तुतियां होती हैं,” यह, अचेतन भी वैसे
ही स्तुति किये जाते हैं। जैसे अक्ष (पासे) आदि ओषधि-
पर्यन्त।
(ख ग) “यथो एतत्०” जो कि यह (कहा)- “पुरुष
सरीखे अङ्गों से स्तुति किये जाते हैं” यह, अचेतनों
में भी यह है। (जैसे-)
“अभिक्रन्दन्त०” (पाषाण = लोढे) हरे २ मुखों से
बुलाते हैं। यह ग्राव (पाषाण) स्तुति है।
(घ) “यथो एतत्” जो कि- यह (कहा-) “पुरुष सरीखे
द्रव्यसंयोगों से” यह, यह भी ऐसा ही है।
“सुखं रथं०” सिन्धु (नदी) ने सुखदायी घोड़ों वाले
रथ को जोड़ा।
(ङ) “यथो एतत्०” जो कि- यह (कहा-) “पुरुषों
सरीखे कर्मों से (देवताओं की स्तुतियां हैं)” । यह भी
वैसा ही है। (जैसे-)
“होतुश्चित्०” होता (अग्नि) से पहिले ही (ये पाषाण)
अद्य (भक्षणीय सोमरस) हविः को अशन (भोजन) कर लेते हैं।
यह ग्रावों (पाषाणों) की स्तुति ही है।
(तीसरा मत)
“अपिवा उभयविधाः स्युः” अथवा दोनों प्रकार के
(देवता) हैं- पुरुषाकार और अपुरुषाकार [क्यों कि- दोनों ही
प्रकार के प्रमाण प्राप्त हैं।]