निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५ ) ७ अ० २ पा० २ खं०
के दृष्टान्त से यह देते हैं कि- नर बुद्धि करने से वे ही बहुत
हैं, और राष्ट्र बुद्धि करने से वे ही एक हैं, केवल विचारक की
दृष्टि का भेद ही विशेष है, वास्तव में दोनों मत एक जैसे हैं
तथा ठीक हैं। यही दृष्टान्त तीसरे एकात्मवाद में भी अनु-
कूल है।
भाष्यकार के इस अन्तिम वाक्य से उनकी अद्वैतनिष्ठा
का भी पता चलता है जहां कहीं भी पर्यवसान करते हैं अनु-
गत अर्थ पर ही करते हैं, किन्तु किसी विशेष पक्ष पर नहीं।
इसी भाव का परिचय इससे अग्रिम देवताकार चिन्तन खण्ड में
भी देंगे। “अपिवा उभयविधाःस्युः” (७,२,३)
“वायुर्वा इन्द्रोवा” यद्यपि वायु और इन्द्र एक ही
देवता है, इस से इस स्थान में एक ही नाम रखना उचित
था, तथापि वायुरूप से वह सदा प्रत्यक्ष है, इससे 'वायु' शब्द
रखा है और मध्यम ज्योति के सब नामों में अधिक प्रसिद्ध होने
के कारण 'इन्द्र' नाम भी दिया है। प्रयोजन यह कि-पहिले
नाम का अर्थ प्रसिद्ध है और दूसरा स्वयम् प्रसिद्ध है इससे
दोनों नामों का यहाँ स्वारस्य देख कर दोनों का ही उपादान
किया है। ऐसा कारण अन्य दो ज्योतियों में नहीं था, इसी
से वहां एक २ नाम ही दिया है ॥ १ ( ५ ) ॥
( खं० २ )
( निरु०- ) अथ आकारचिन्तनं देवतानाम् ।
पुरुषविधाः स्युः-इति एकम् ।
(क) चेतनावद्वद् हि स्तुतयो भवन्ति ।
(ख) तथा अभिधानानि ।